कश्मीर के आधुनिक इतिहास के बारे में तीन अकाट्य तथ्य हैं: पहला, पाकिस्तान घाटी के साथ ही भारत के अन्य हिस्सों में (कश्मीर का बहाना बनाकर) लगातार हिंसा और आतंक को बढ़ावा दे रहा है। दूसरा, जिनके बारे में माना जा रहा था कि वे कश्मीरियों का नेतृत्व करेंगे, उन्होंने घाटी में जातीय आधार पर पंडितों के जनसंहार को लेकर किसी तरह का अफसोस या प्रायश्चित करने का कोई संकेत नहीं दिया।
तीसरा, एक के बाद एक बनने वाली भारतीय सरकारों ने (एक अपवाद को छोड़कर जिसके बारे में आगे बताऊंगा) चुनाव में धांधली की, भ्रष्टाचार को बढ़ाया, राज्य की ताकत का इस्तेमाल किया और अन्य तरीकों से घाटी में अलोकतांत्रिक प्रथाओं को बढ़ावा दिया।
ये तीनों बातें स्वतंत्र रूप में और एक साथ भी सही हैं। फिर भी जो लोग कश्मीरियों और कश्मीर की नियति का फैसला करना चाहते हैं, वे इनमें से कुछ सच्चाइयों को तो स्वीकार करते हैं, मगर सभी को नहीं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान तीसरे सत्य पर तो ध्यान केंद्रित करता है, जबकि पहले और दूसरे सत्य को वह दबा रहा है। अतिराष्ट्रवादी भारतीय इसका ठीक उलटा कर रहे हैं।
इस प्रकार, जिन लोगों ने अनुच्छेद 370 के हाल ही में निष्प्रभावी किए जाने की इतनी जल्दी और अनजाने में सराहना की है, उन्होंने पाकिस्तान द्वारा प्रोत्साहित आतंक और पंडितों के उत्पीड़न को औचित्य के रूप में इस्तेमाल किया है। वास्तव में जिस तरह से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया, उससे सिर्फ कश्मीर के संबंध में तीसरे सत्य की पुष्टि हुई है और उसे मजबूती मिली है।
पिछले हफ्ते जो कुछ हुआ, वह भारतीय राज्य द्वारा घाटी में किए जाने वाले मनमाने और निरंकुश आचरण के कई उदाहरणों में से ही सबसे ताजा मामला है। कश्मीर घाटी में पहला राजनीतिक अपराध ठीक छियासठ वर्ष पहले अगस्त, 1953 में किया गया था, जब जम्मू-कश्मीर के निर्वाचित मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को पदच्युत कर उन्हें जेल भेज दिया गया था। वह पांच साल तक जेल में रहे, उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया गया।
1958 में शेख को थोड़े समय के लिए रिहा किया गया, लेकिन उन्हें दोबारा फिर से पांच वर्षों के लिए जेल भेज दिया गया। इस बार उन पर पाकिस्तानी एजेंट होने का आरोप लगाया गया। यह आरोप हास्यास्पद होने के साथ ही घृणित भी था, क्योंकि शेख दुविधा में थे कि भारत के साथ जाएं या आजादी का समर्थन करें, लेकिन कहीं दूर तक भी पाकिस्तानी राज्य के साथ उनका कोई लगाव नहीं था, क्योंकि उनका मानना था कि हिंदुओं और सिखों को बिल्कुल मुस्लिमों जैसे अधिकार प्राप्त हैं।
वह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे, जिन्होंने कश्मीर के निर्वाचित मुख्यमंत्री को शर्मनाक और अवैध तरीके से गिरफ्तार करने की मंजूरी दी थी। अप्रैल, 1964 में देर से नेहरू का ह्रदय परिवर्तन हो गया और शेख को रिहा किया गया। यह त्रासदपूर्ण था, जब नेहरू के निधन के बाद शेख को फिर से जेल भेज दिया गया, जहां उन्हें पहले लाल बहादुर शास्त्री और फिर इंदिरा गांधी के आदेश पर सात वर्ष बिताने पड़े।