वैश्वीकरण के दौर की शिक्षा चुनौतीपूर्ण अपेक्षाओं से आहत है।
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नई-नई चुनौतियां
मौजूदा परिदृश्य पैराडाइम-शिप्ट का है। सारी धारणाएं-अवधारणाएं नये अर्थ ग्रहण करने को आतुर है। ऐसे में समाज का मार्गदर्शक वर्ग शैक्षिक समाज अतिरिक्त दायित्वों के दोहरे दबावों के साथ नई-नई चुनौतियों से मुखातिब हैं। उनमें भी तकनकी से जुड़ी चुनौतियां ज्यादा चैलेंजिंग है।
वैश्वीकरण के दौर की शिक्षा चुनौतीपूर्ण अपेक्षाओं से आहत है। आर्थिक विकास, रोजगार, ज्ञान और अवसरों तथा शांति, समृद्धि और सुरक्षा के सवालों को एक साथ कैसे सुलटाये। आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के बीच तालमेल कैसे बनाए। इससे भी ज्यादा विचलित करने वाली बात यह है कि अभी तक जो आधुनिकता व्यक्ति, विवेक और लोकतंत्र की हिमायती दिखती थी, जिसके कसीदे पढ़ती हमारी कई पूर्व पीढ़ियां गुजर गई है।
वास्तविकता यह है कि वहीं आधुनिकता अल्प-सूक्ष्म-समूह का आदर्श बनकर विषमताओं और गहरी आर्थिक असमानताओं को संस्थागत कर गई है। शिक्षा उसकी ढाल बनती चली गई। आधुनिकता ने टैक्नोलॉजी और मीडिया की मिलावट से बाजार विस्तार की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को शिक्षा के सहारे ही परवान चढ़ाया।
शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से ही सामाजिक-सांस्कृतिक अतिक्रमण किए गए। परिणामतः ज्ञान भी एक उत्पाद में रुपांतरित होता चला गया। शिक्षा का जो असली दायित्व था वह विचलन का शिकार हो गया है। नतीजतन शांति की संस्कृति तो जैसे लुप्त प्रायः ही होती चली गई और शिक्षा गहन स्पर्धा के साथ अत्याधिक असुरक्षित वैश्विक परिस्थितियों से निपटने का एक ठूठ हथियार सी साबित हुई।
शैक्षिक समाज का निर्माण
ऐसे में समाज के उस बौद्धिक तबके, जो मिलकर एक शैक्षिक समाज का निर्माण और विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन करता है। जिसमें विशेषतः शिक्षा, शिक्षक, शैक्षणिक संस्थान, शिक्षा-नियंता और शिक्षार्थी शामिल है। उनसे ही अंतिम आशा है। उनसे ही कुछ उम्मीद बंधती है। इसलिए शिक्षा जगत इस उभरते अंतर्राष्टृय परिदृश्य में विश्व चिंता के केन्द्र में है।
शिक्षक उस केन्द्र बिन्दु की तरह चिन्हित है, जो समाज के लिए कम्पास की सुई की तरह दिशा-दिग्दर्शन की एकमात्र आशा-व्यवस्था है। शिक्षा व्यक्ति, समाज और राष्टृ निर्माण की समग्र सामग्री है। इसलिए विकास की दिशा में नए दबावों के साथ आगे बढ़ना ही होगा। वैश्वीकरण ने दुनियायीं संपर्क बढ़ा दिए है। व्यक्तियों, वस्तुओ और विचारों के विभिन्न पक्षों में समरुपता ला दी है। खासतौर से उपभोग के स्तर पर।
कैसे होगी दुनिया में शांति, समानता और समृद्धि कायम
साथ ही सभी समाज वैश्विक उत्पादों के साथ-साथ नये मूल्यों, विचारों, मानकों और नई नैतिकताओं तथा नई सामूहिकताओं से भी नई सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं का वरण कर रहे है। इस बदलती दुनिया के साथ सह-अस्तित्व, समायोजन और सहकार की संस्कृति विकसित करना शैक्षिक परिक्षेत्रों का अहम उत्तरदायित्व है। तभी दुनियां में शांति, समानता और समृद्धि की संस्कृति कायम हो सकती है।
21वीं सदी में शिक्षक, शिक्षा और शिक्षण संस्थाओं की भूमिका क्या हो? नई सदी के नये शिक्षक कैसे हो? क्योंकि बदलती दुनियां की बदलती शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ ज्ञानार्जन नहीं है। शिक्षा भी उन्हीं सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से उपजा उत्पाद है जिन्हें समाज ने सहयोग-संधर्ष की प्रक्रिया के साथ अपनी जरुरतों और आंकांक्षाओं के अनुरुप गढ़ा।
सोशल मीडिया के इस भयावह दौर में उन्हें सही दिशा में संचार और संवाद करने के गुर सिखा सके।
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शिक्षा ज्ञान को पाने का साधन
वास्तव में यदि ज्ञान साध्य है तो शिक्षा उस ज्ञान को पाने का साधन है। इन हालातों में शिक्षा क्या है और वह कौन-सा परिदृश्य है जिसमें शिक्षा बदल रही है? शिक्षा के बदलते परिवेश में नए शिक्षक की नई भूमिकाएं क्या उभर रही है? समाज प्राकृतिक अवस्था से निकल कर नई सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था में संगठित होता गया तो शिक्षा उसका हिस्सा होती गई। मनुष्य को समाजीकृत करने का काम शिक्षा व्यवस्था ने संभाला।
शिक्षा आवश्यकताओं के अनुरुप अभिक्षमताओं को विकसित करने का काम करती है। जिससे भावी जटिल दुनियां में जीने में आसानी रहे। युगानुकूल पूर्वानुमानों या अप्रत्याशित परिवर्तनों को समझने में मदद मिल सके। मनुष्य एक स्मार्ट नागरिक बन सके। अपने समाज, राष्टृ और देश को दिशा देने में सहायक हो सकें।
एक श्रेष्ठ निर्णायक, समस्या निवारक और सक्षम नागरिक तैयार करना ही शिक्षा की प्राथमिकता है। समाज, राजनीति, नई अर्थ-संरचनाएं और विश्व के सतत् संकट गरीबी, असमानता, हिंसा, पर्यापरण-क्षरण जिन नये जीवन-मूल्यों से उपजी समाधानात्मक जीवन दृष्टि की अपेक्षा शिक्षा से रखते है।
उसके लिए 21वीं सदी के शिक्षक सर और गुरु दोनां से कुछ अलग होने की दरकार को ध्यान में रखे। “गुरु-गोविन्द दोउ खड़े” की मनोदशा में विश्व समाज “गुरु-गूगल दोउ खड़े” के द्वंद से दो-चार हो रहा है। शिक्षक, शिक्षा और शिक्षण संस्थाएं सब के सब आमूल-चूल परिवर्तनों की तरफ बढ़ रहे है।
बड़ी चिंता
ऐसे में प्राथमिकताओं का प्रण करना सरल नहीं है। समाज की अपनी जरुरतें है तो राजनीति के अपने तकाजे है और बाजार तो खनन के ख्याल से कभी बाहर आता ही नहीं। ऐसे में सार्वभौमिकताओं को सहेजने वाली मानवता का दिग्दर्शन कराने वाली नई शैक्षिक संस्कृति कैसे उभरे? यह बड़ी चिंता है।
21वीं सदी के शिक्षार्थियों की नई पीढ़ी गूगल के गर्भ से निकली है। जो बहुत सी ऐसी सूचनाओं से सराबोर है जिनसे आज का टीचर भी शायद न हो। इस पीढ़ी को रूढ़ीवादी शिक्षक नहीं संभाल पायेगें। ये नए जमाने के नौजवान है। इस जनरेशन को अपना एक संवाद सहयोगी चाहिए। जो उनकी बाते सुन सके।
सोशल मीडिया का दौर
जिन तनावों से वे तार-तार हो रहे है, उन्हें उनके समाधान दे सके। सोशल मीडिया के इस भयावह दौर में उन्हें सही दिशा में संचार और संवाद करने के गुर सिखा सके। छात्रों और उनके अभिभावकों के बीच मजबूत ब्रिजिंग कर सके। इस सब के लिए नए शिक्षक को नवाचार का नायक बनना होगा। नई धारणाओं-अवधारणाओं के बीच समाज को नव-जीवन मूल्यों से समायोजन सिखाना होगा।
परम्परा और आधुननता के बीच सेतु बनाने की सृजनात्मकता के वातावरण का वाहक बनना होगा। टैक्नोलॉजी ने हमारे घर में रहने-सोने से लेकर सड़क सुरक्षा तक को और विकास के आधार शिक्षा-व्यवस्था तक को निर्देशित और संचालित करना तय कर लिया है। टैक्नोलॉजी को जीवन उपयोगी और जनोपयोगी बनाने की दिशा में विशेष रुप से काम करने की जरुरत है।
अब इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है। टैक्नोलॉजी से लैस नया शिक्षक नए माहौल में नव-संस्कृति के विकास में नायक की भूमिका में अपने गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन करे। तभी भारतीय शिक्षक अपने सनातन सिंहासन गुरु-गोविन्द दोऊ खड़े.........पर अपने प्रथम स्थान को कायम रख सकेगा। विश्व कल्याण के दायित्व बोध और विश्वास से भरा अपने स्थान पर विराजमान रहेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ सबको शिक्षक दिवस की बधाई...
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