फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

महात्मा गांधी: सत्य और अहिंसा का एक ऐसा विचार, जिसने ब्रिटिश मैडलिन को 'मीराबेन' बना दिया

विज्ञापन
मैडलिन, जिसने महात्मा गांधी को देखा तक नहीं था, उन्हें जीवन समर्पित करने की ठान ली
विज्ञापन

महात्मा गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं रहे, बल्कि वे विचार बन कर पूरी दुनिया के लिए वंदनीय हो चुके हैं। विदेशों में जगह-जगह उनकी मूर्तियां इस बात का प्रमाण है कि गांधी के बारे में जिसने भी जाना, बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाया। महिलाओं के प्रति गांधी के विचारों की खूब चर्चा होती है। गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनके भीतर स्त्री संवेदना उनके जीवन में आई महिलाओं से ही पल्लवित हुई। फिर चाहे वो मां पुतलीबाई हों, पत्नी कस्तूरबा हों या फिर अन्य तमाम महिलाएं, जो उनके संपर्क में आईं और फिर उनके साथ सहभागी बनीं। 

विज्ञापन


पत्नी कस्तूरबा ने कभी खुद पर गांधीजी को एक पति के रूप में हावी नहीं होने दिया। कस्तूरबा का व्यवहार गांधीजी को प्रेरित करता था, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी किया है। आजादी के आंदोलन के दिनों की महात्मा गांधी की तस्वीरों पर आपने गौर किया होगा तो देखा होगा कि उनके आसपास अक्सर महिलाएं भी रहती थीं। 

दरअसल, इन सभी महिलाओं की जिंदगी में गांधीजी का गहरा प्रभाव रहा है और गांधी के जीवन में भी इन महिलाओं को प्रभाव रहा है। गांधीजी ने शांति और अहिंसा के साथ संयम, त्याग आदि जिन रास्तों पर चलना शुरू किया था, ये महिलाएं भी उसी रास्ते पर चलते हुए अपनी जिंदगी में आगे बढ़ीं। मोहनदास के महात्मा गांधी और फिर बापू बनने के सफर में कई महिलाएं सहभागी बनीं। 
विज्ञापन


इन महिलाओं में कस्तूरबा गांधी, मनुबेन, आभाबेन, सुशीला नायर, राजकुमारी अमृत कौर, सरोजिनी नायडू, सरलादेवी चौधरानी आदि कई नाम हैं। इनमें एक अलग नाम मैडलिन स्लेड का भी है, जिसे 'गांधीजी के संसर्ग' ने मीराबेन बना दिया। मैडलिन गांधीजी से इतनी ज्यादा प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपनी सुख-सुविधा, विलासिता, चैन, आराम, धन-दौलत यहां तक कि अपना देश भी छोड़ दिया। 

मैडलिन स्लेड इंग्लैंड के अति संभ्रांत परिवार में 22 नवंबर 1892 को जन्मीं। एक ओहदेदार ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की बेटी होने की वजह से वह बहुत अनुशासित थीं। 1923 में मेडेलीन पहली बार फ्रांसीसी लेखक रोमैन रौलेंड के संपर्क में आईं, जिन्होंने न केवल गांधीजी की बायोग्राफी लिखी, बल्कि उनसे मैडलिन का परिचय भी कराया। 

मैडलिन, जिसने महात्मा गांधी को देखा तक नहीं था, उन्हें जीवन समर्पित करने की ठान ली। गांधी के बारे में पढ़कर रोमांचित हुईं और खत लिखकर आश्रम आने की इच्छा जाहिर की। अक्तूबर 1925 में वह अहमदाबाद पहुंचीं।

विज्ञापन

एक कृष्ण की दिवानी मीरा थीं और एक गांधीजी के विचारों की दिवानीं मीरा - फोटो : mkgandhi.org
बीबीसी की एक रिपोर्ट में गांधीजी से उनकी पहली मुलाकात का जिक्र पढ़ा। मैडलिन ने बयां किया है,

जब मैं वहां दाखिल हुई तो सामने से एक दुबला शख्स गद्दी से उठकर मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैं जानती थी कि ये शख्स बापू ही हो सकते हैं। मैं हर्ष और श्रद्धा से भर गई थी, मुझे सामने एक दिव्य रोशनी दिखाई दे रही थी, जिनके पैरों में झुककर मैं बैठ गई, बापू ने मुझे उठाया और कहा- तुम मेरी बेटी हो। 


मैडलिन और महात्मा गांधी के बीच इस दिन से पिता-पुत्री का रिश्ता बन गया। बापू ने उन्हें मीराबेन नाम दिया। अपनी आत्मकथा में मीराबेन ने लिखा है,

पांच साल की उम्र से ही कभी कोई पंछी की आवाज या पेड़ों की सरसराहट मुझे दूर कहीं दूर ले जाती थी। मैं जीवन में किसी ‘अज्ञात प्रेरणा’ के वशीभूत हो उस छुपे सत्य को ढूंढने के लिए घोड़े की पीठ पर बैठ अपने नाना के गांव जाती थी। विशाल घर से खेतों, जंगलों, नदियों और सागर के आस-पास जाकर प्रकृति से अपना नाता जोड़ा करती और मुझे उस ‘अज्ञात स्वर’ में भय के बजाय अपार आनंद का अनुभव होता।

उन्होंने अपने उस ‘अज्ञात’ की खोज में ही पश्चिम के महान संगीतकार बीथोवन से प्रभावित हुई थीं, जिन्होंने सूरदास की ही तरह अपने समस्त चिंतन को संगीत में ढाल लिया था। वह बीथोवन की समाधि तक भी पहुंची थीं। बीथोवन के बाद भी उन्हें लगता था कि कोई अज्ञात प्रेरणा उन्हें बुला रही है। मैडलिन ने जब गांधीजी के बारे में जाना तो उन्हें लगा, वे वही अज्ञात प्रेरणा हैं, जिनकी उन्हें तलाश थी। 

अपनी आत्मकथा में वह लिखती हैं, "मुझे बापू के पास जाना था, जो सत्य और अहिंसा की राह पर चलते हुए जुल्मों से पीड़ित भारतीयों की सेवा कर रहे थे।" पश्चिम की मैडलिन कब पूरब की मीराबेन बन गई, उन्हें भी न पता चला। वह न केवल खान पान, रहन सहन और वेश भूषा से हिन्दुस्तानी बन गईं बल्कि उन्होंने सेवा और ब्रह्मचर्य का व्रत भी ले लिया।

आजादी की लड़ाई में मीराबेन ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और कई बार गिरफ्तार भी हुईं। जेल गईं, निकलीं और फिर से आंदोलन में साथ रहीं। एक कृष्ण की दिवानी मीरा थीं और एक गांधीजी के विचारों की दिवानीं मीरा। गांधी एक ऐसी विचारधारा हैं, जिसे अपनाने से बुरी प्रवृति के व्यक्ति में भी मनुष्यता आ जाती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें