एक कृष्ण की दिवानी मीरा थीं और एक गांधीजी के विचारों की दिवानीं मीरा
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बीबीसी की एक रिपोर्ट में गांधीजी से उनकी पहली मुलाकात का जिक्र पढ़ा। मैडलिन ने बयां किया है,
जब मैं वहां दाखिल हुई तो सामने से एक दुबला शख्स गद्दी से उठकर मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैं जानती थी कि ये शख्स बापू ही हो सकते हैं। मैं हर्ष और श्रद्धा से भर गई थी, मुझे सामने एक दिव्य रोशनी दिखाई दे रही थी, जिनके पैरों में झुककर मैं बैठ गई, बापू ने मुझे उठाया और कहा- तुम मेरी बेटी हो।
मैडलिन और महात्मा गांधी के बीच इस दिन से पिता-पुत्री का रिश्ता बन गया। बापू ने उन्हें मीराबेन नाम दिया। अपनी आत्मकथा में मीराबेन ने लिखा है,
पांच साल की उम्र से ही कभी कोई पंछी की आवाज या पेड़ों की सरसराहट मुझे दूर कहीं दूर ले जाती थी। मैं जीवन में किसी ‘अज्ञात प्रेरणा’ के वशीभूत हो उस छुपे सत्य को ढूंढने के लिए घोड़े की पीठ पर बैठ अपने नाना के गांव जाती थी। विशाल घर से खेतों, जंगलों, नदियों और सागर के आस-पास जाकर प्रकृति से अपना नाता जोड़ा करती और मुझे उस ‘अज्ञात स्वर’ में भय के बजाय अपार आनंद का अनुभव होता।
उन्होंने अपने उस ‘अज्ञात’ की खोज में ही पश्चिम के महान संगीतकार बीथोवन से प्रभावित हुई थीं, जिन्होंने सूरदास की ही तरह अपने समस्त चिंतन को संगीत में ढाल लिया था। वह बीथोवन की समाधि तक भी पहुंची थीं। बीथोवन के बाद भी उन्हें लगता था कि कोई अज्ञात प्रेरणा उन्हें बुला रही है। मैडलिन ने जब गांधीजी के बारे में जाना तो उन्हें लगा, वे वही अज्ञात प्रेरणा हैं, जिनकी उन्हें तलाश थी।
अपनी आत्मकथा में वह लिखती हैं, "मुझे बापू के पास जाना था, जो सत्य और अहिंसा की राह पर चलते हुए जुल्मों से पीड़ित भारतीयों की सेवा कर रहे थे।" पश्चिम की मैडलिन कब पूरब की मीराबेन बन गई, उन्हें भी न पता चला। वह न केवल खान पान, रहन सहन और वेश भूषा से हिन्दुस्तानी बन गईं बल्कि उन्होंने सेवा और ब्रह्मचर्य का व्रत भी ले लिया।
आजादी की लड़ाई में मीराबेन ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और कई बार गिरफ्तार भी हुईं। जेल गईं, निकलीं और फिर से आंदोलन में साथ रहीं। एक कृष्ण की दिवानी मीरा थीं और एक गांधीजी के विचारों की दिवानीं मीरा। गांधी एक ऐसी विचारधारा हैं, जिसे अपनाने से बुरी प्रवृति के व्यक्ति में भी मनुष्यता आ जाती है।
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