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गांधी के देश में असुरक्षित बेटियां, शहर-शहर निर्भया, डगर-डगर सवाल

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आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां मनुष्यता ही मरने के कगार पर है और अंतिम सांसे ले रही है
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यह वर्ष महात्मा गांधी के जन्म की 151वीं वर्षगांठ का है। वैश्विक स्तर पर गांधी को याद किया जा रहा है। उनके अंहिंसा के सिद्धांतों का पाठ किया जा रहा है। अहिंसा के सिद्धांत को जीवन जीने का मूल मंत्र बनाया जा रहा है। ऐसे में इन दिनों व्हाट्सअप पर एक चित्र बहुत घूम रहा है जिसमें स्टेचू पर खड़े बापू (महात्मा गांधी) दुखी होकर अपनी लाठी एक महिला को दे रहे हैं। 

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लाठी विरोध व हिंसा का भी प्रतीक है और आत्मरक्षा में उठाया गया शस्त्र भी है। गांधी आजीवन शस्त्रों के प्रयोग का विरोध करते रहे लेकिन यह चित्र उसी की प्रतीकात्मक मौन स्वीकृति के रूप में प्रयोग किया गया है। गांधी का भारत तब से अब तक बहुत बदल गया है। यह व्यवस्था गांधी को कितना ही याद कर ले उनके भारत की दुहाई दे दे, लेकिन वह उनके विचार और सिद्धांतों से अभी कोसों दूर है। 

गांधी ने मनुष्यता को मनुष्य होने का सबसे बड़ा गुण माना था लेकिन आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां मनुष्यता ही मरने के कगार पर है और अंतिम सांसे ले रही है। आज वहीं की बच्ची, बेटियों के साथ व्यस्क और यहां तक कि बुजुर्ग महिलाएं भी सुरक्षित नहीं है। ऐसे में उन्हें खुद ही अपनी आत्मरक्षा के लिए मुखर होना होगा। प्रतीकात्मक रूप से महिला को दी जाने वाली गांधी की लाठी उसी मुखरता का प्रतीकात्मक रूप है।
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आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहां स्त्री पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। पूरे देश में गांव, कस्बा, शहर सभी जगह बलात्कार की बढ़ती घटनाओं और उनमें भी हिंसा के अतिरेक ने स्त्री सुरक्षा के प्रश्न को हमेशा खड़ा किया है। लेकिन हमारी व्यवस्था ऐसी है जिसमें कठोर से कठोर कानून तो मौजूद है साथ ही उस कानून के काट भी मौजूद है। इसे करीब से जानना हो तो निर्भया केस के दौरान प्रतिपक्ष व अपराधियों की दलीलों से समझा जा सकता है। इसी कारण अधिकांश अपराधी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के बाद सुरक्षित बच निकलते हैं। 

यह हमारे समाजीकरण का भी दोष है कि बलात्कार जैसे अपराध करने वाले दोषी के पक्ष में लोग कभी धर्म, जाति तो कभी वर्गीय आधार पर खड़े होकर उसे सुरक्षित करने लगते हैं और इस तरह के अपराध को राजनैतिक चश्मा पहनाना शुरू कर देते हैं। जो अपराध के लिए अपराधियों के मनोबल को बढ़ाता है। बलात्कार की घटनाओं में एकजुटता का अभाव स्त्री के प्रति हिंसा को बढ़ावा देता है। क्योंकि आज भी स्त्री हिंसा पर गुट बाजी की मानसकिता अधिक है। 

स्त्री को कभी जाति के चश्मे से देखा जाता है तो कभी धर्म के चश्मे से तो कभी वर्ग के चश्मे से। इन सब के बीच वह हिंसा के हमेशा केंद्र में रही है। हम कितना ही कहें कि स्त्री की जाति होती है, लेकिन यह सत्य नहीं है। स्त्री की कोई जाति और धर्म नहीं होता है। समाज व पारिवारिक संबंधों में जन्म से उसे जो मिलता है वह फिर विवाह के बाद बदल जाती है। प्रत्येक स्त्री किसी न किसी रूप में इससे गुजरती है। उसकी अपनी स्वतंत्र पहचान आज भी एक स्त्री के रूप में समाज में स्वीकार्य नहीं है। 

इतिहास इसका गवाह है कि धर्म, जाति, मजहब के नाम पर जब भी विद्वेष हुआ, स्त्री शोषित और बलत्कृत हुई
तभी तो कभी जाति के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर उसे हिंसा का केंद्र बनाया गया और हर बार उस यौन हिंसा की प्रतिक्रिया में हमने जाति और धर्म को दोष दिया। जबकि वह न तो जाति की पोषक थी न ही धर्म की। वह केवल एक माध्यम भर है। दोष स्त्री के प्रति कुंठित मानसिकता और पितृसतात्मक व्यवस्था के पुरुधाओं के अहम पर चोट का था जो पूरे भारतीय समाज में सभी जातियों और धर्मों के भीतर मौजूद है जिसे आज भी देखा जा सकता है। 

तभी तो गली मोहल्लों की लड़ाई में पहली गाली ही स्त्री को केंद्र में रख कर दी जाती है। उसके बाद वही हिंसा अधिक मुखर होकर महिलाओं का शाब्दिक बलात्कार तक कर देती है। मगर वहाँ भी विरोध में सिर्फ मौन मिलता है क्योंकि यह गाली व्यवहार और संस्कार के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारिवारिक व सामाजिक संपति बनकर चली आ रही है तो इन संस्कारों का विरोध कैसा? 

इतिहास इसका गवाह है कि धर्म, जाति, मजहब के नाम पर जब भी विद्वेष हुआ, स्त्री शोषित और बलत्कृत हुई। क्योंकि हमारे समाज में स्त्री को परिवार का सम्मान और इज्जत के भाव के साथ बड़ा किया जाता है और यही भाव उसे विद्वेष में हिंसा का केंद्र बनाता है। आज भी गांव, कस्बों से लेकर शहरों तक में स्त्री को देखने की मानसिकता में बदलाव नहीं आया है। उसके साथ जघन्य से जघन्य अपराध होने पर भी उसे ही प्रश्न के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और अपराधी शक्ति के बल पर निर्दोष बना दिया जाता है। 

इस तरह के अपराधों में जमीनी रूप से सक्रिय कार्यवाही के साथ ही फास्टट्रैक कोर्ट और सजा की सुनवाई की अपेक्षा राजनीति अधिक सक्रिय हो जाती है। ऐसे में प्रतिदिन घटती बलात्कार की घटनाएं भीतर तक गुस्सा भर देती है और समाज-व्यवस्था के प्रति खीज उत्पन्न करती है। नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश के भीतर ही हर दिन 109 बच्चे यौन शोषण और रेप से गुजरते हैं।

कितने केस महिलाओं के साथ होते है, जिन पर चर्चा नहीं होती या वह परिवार व सामाजिक डर से छिपा दिए जाते हैं। कितने अगवा करके मार दिए जाते हैं। बच्चों और महिलाओं के साथ अपराध की बढ़ती घटनाओं को रोकने में कानून भी अपनी भूमिका का सही निर्वाह नहीं कर रहा है। तभी तो आज एक आम स्कूल से निकलकर कॉलेज जाने वाली लड़की सवाल करती है कि हम सुरक्षित कहां हैं? 
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जो कानून हमारी सुरक्षा के लिए बने हैं उसके अलावा क्या कानून में इन अपराधों को रोकने के लिए अन्य विकल्प नहीं है?
आप कहते हैं हमारे लिए कानून बना है उसमें बहुत सारे बदलाव भी आए हैं। लेकिन मैं तो रोज इस तरह की घटनाओं को अपने आसपास देख और सुन रही हूं। सितंबर में दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में एक नौ साल की लड़की से नाबालिगों द्वारा रेप किया जाता है। मुजफ्फरपुर में एक लड़की अगवा कर ली जाती है। समयपुर बादली में 13 साल की लड़की का रेप होता है। एक 90वर्ष की बुजुर्ग महिला का रेप होता है। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में लड़की का गैंगरेप होता है और उसकी मौत हो जाती है। इस घटना पर पुलिस कार्रवाई शुरू भी नहीं हुई थी कि बलरामपुर में एक ओर बलात्कार की घटना घट जाती है। 

यह सभी घटनाएं सितंबर माह की है, जो किसी न किसी रूप में मीडिया और सोशल मीडिया से बाहर आई हैं। इन घटनाओं से देखा जा सकता है कि हमारे समाज में स्त्री देह को योनि से अधिक कुछ नहीं समझने की मानसिकता में अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है। नेताओं से लेकर सामान्य व्यक्ति तक के भीतर स्त्री के प्रति कुंठा देखी जा सकती है जिसे उनके बयानों और स्त्री संबंधी भाषा के प्रयोग से जाना जा सकता है। 

ऐसे में जब किशोरावस्था की लड़कियां जो पढ़ लिखकर आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं और न्यायिक व्यवस्था, राजनीति को देख और समझ रही हैं तो वे सवाल करती हैं कि हमारा समाज उत्थान की ओर जा रहा है या अपने पतन का इतिहास लिख रहा है। आप ही बताइए जब दिल्ली जैसा महानगर, जहां सभी तरह के जागरूकता कार्यक्रम होते रहते हैं, जो दूर-दराज के गांवों व कस्बों से अधिक सशक्त भी है, बताइए यहां जब इतनी सारी बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं तो गांवों और कस्बों की क्या स्थिति होगी? 

जो कानून हमारी सुरक्षा के लिए बने हैं उसके अलावा क्या कानून में इन अपराधों को रोकने के लिए अन्य विकल्प नहीं है? मैं कब खुद को सुरक्षित महसूस कर पाऊंगी?’ ऐसे में मेरे पास इसका एक ही जवाब होता है खुद को इतना मजबूत बनाओ, ताकि अपने लिए और दूसरों के लिए लड़ सको। क्योंकि आज जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां कानून भी लाचार हो गया है और मीडिया को तो टीआरपी की दीमक खा चुकी है।

बलात्कार, यौन शोषण की घटनाएं मीडिया के लिए आम घटना बन कर रह जाती है। ऐसे में हमें, परिवार और समाज को सोचना है कि क्या हम अपने बच्चों को घर में बंद करके सुरक्षित रख सकते हैं या उन्हें इस यथार्थ के साथ मजबूत बनाकर अपने आत्मसम्मान की लड़ाई के लिए आगे बढ़कर जीना सिखाकर? 

यह आपका अपना निर्णय है। आज का समय खुद को मजबूत बनाने और स्त्री हिंसा के प्रति सामाजिक व्यवस्था के पुरजोर विरोध का है तभी ऐसे समाज में स्त्री खुद को सुरक्षित बचा सकेगी अन्यथा यह सामाजिक व्यवस्था, अपराधी के मानवाधिकार की तो सुरक्षा करती हैं और शोषित को शोषित होने का दंड देने से भी गुरेज नहीं करती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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