इस दौरान टिंटोडी का एक जोड़ा लंबे समय तक पूरे परिवार का आकर्षण केंद्र बना रहता है। मारवाड़ी बोली का यह नाम इसे शायद इसकी कर्कश व तीखी आवाज के कारण ही दिया गया है। इस जोड़े ने पड़ोस की एक बाड़ी की दीवार पर घोंसला बनाया है। यदि पक्षियों में उम्दा घोंसला बनाने की प्रतिस्पर्धा रखी जाए तो टिंटोडी का स्थान शायद सबसे पीछे ही रहेगा, क्योंकि टिंटोडी का घोंसला एकत्रित किए कुछ छोटे कंकरों का समूह मात्र होता है जिसके मध्य में मादा दो से तीन अंडे देती हैं।
सम्पूर्ण प्रजनन काल के दौरान नर व मादा दोनों भोजन-पानी की तलाश में अधिक दूर नहीं जाते हैं। बच्चे अंडे से बाहर आने के कुछ दिनों में ही मैदान में भागने लगते हैं। इनका रंग आस-पास के आवास से मिलता जुलता होता है, जो कि इन्हें शिकारी की नजरों से बचाता है। वयस्क अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए काफी सचेत व आक्रामक रहते हैं एवं किसी भी तरह का खतरा होने पर बड़े जीवों पर भी हमला करने से नहीं हिचकिचाते। टिंटोडी को अपने बच्चे पालते देखना हमारा हर दोपहर का जरूरी काम बन चुका था।
एक दोपहर दोनों वयस्क असामान्य रूप से चहचहाते इधर-उधर उड़ रहे थे। उनका यह आक्रामक स्वभाव देख मानो लग रहा हो कि कहीं कोई परभक्षी घुस आया हो। हालांकि पूरे दिन की खोज व इंतजार के बाद भी ना ही किसी परभक्षी का सुराग मिला न ही बच्चों का। सांझ होते दोनों वयस्क थक कर वापस उसी स्थान पर आ गए जहां उन्होंने कभी अपना घोंसला बनाया था। इस साल दूसरी बार भी यह जोड़ा अपने बच्चों को पालने में नाकाम हो गया था।
शायद अगले प्रजनन काल में उनके ये प्रयास सफल हो सकें। घर में टिंटोडी के बच्चों का अचानक यूं ही गायब हो जाना कुछ दिनों तक चर्चा का विषय रहा एवं अंत में सर्वमत से एक गोह को इस कृत्य का दोषी माना गया जो काफी दिनों से इस इलाके सक्रिय था। माहौल सामान्य होने के कुछ ही दिनों में घर के सामने विलायती बबूल की झाड़ी के नीचे सवेरे की नींद से जगाने वाले उस तीतर का भी घोंसला पाया गया।
छोटे शहरों की आभा यहां स्वछंद रूप से पाए जाने वाले जीवों की इसी विविधता में है जो यहां के निवासियों को झंझट भरी जिंदगी में भी किसी न किसी रूप में प्रकृति से जोड़े रखती है। औद्योगीकरण के इस दौर में भी इस तरह की जैव-विविधता को घर के निकट पाना एक सौभाग्य ही माना जा सकता है।
लेखक का परिचय: चेतन मिश्र वन्यजीव विज्ञान के शोधार्थी हैं। वर्तमान में ATREE, बैंगलोर के साथ पीएचडी की पढ़ाई कर रहे हैं।
यह श्रृंखला 'नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशंस' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से संबंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।
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