मुरादनगर हादसे की तस्वीर
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यकीनन मुराद नगर का हादसा केवल दैवी प्रकोप नहीं है। यह कोई अप्रत्याशित घटना भी नहीं है। यह शुद्ध रूप से मानवीय अपराध है, क्योंकि निर्माणाधीन भवन में नितांत घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया और छत भरभराकर गिर पड़ी। अगर निर्माण में रेत के साथ पर्याप्त अनुपात में सीमेंट भी होती तो शायद यह हादसा न होता। यह हादसा उस निष्ठुर और स्वार्थी सोच का परिणाम है, जिसमें पैसे खाने के खेल के आगे इंसानी जान की कोई कीमत नहीं है। ऐेसी सोच जो खुद को किसी भी जवाब देही से परे मानती है। अभी यह साफ नहीं है कि मरने वालों में नगर पालिका के जिम्मेदार अफसरों और ठेकेदारों का भी कोई नाते रिश्तेदार है या नहीं।
पर इतना तय है कि भ्रष्टाचार अंधा होने के साथ-साथ दुष्ट भी होता है। उसके लिए मंगल भवन और शोक सदन में कोई फर्क नहीं है। जिसकी नींव ही इंसानी लाशों और मानवता की कराह पर टिकी होती है। वो यह सोचना भी नहीं चाहते कि इसी श्मशान घाट पर उनको भी आना है। भ्रष्टाचार से कमाई एक-एक पाई यहीं छोड़ कर जाना है। मुराद नगर हादसे ने उन यमदूतों को भी लजा दिया है, जो अपना काम पूरी निर्ममता से करते हैं। इसे समझने के लिए तीक्ष्ण बुद्धि की जरूरत नहीं है कि मुराद नगर श्मशान घाट की कमीशन खोरी में भी ऊपर तक हिस्सेदारी होगी।
उसके लिए हरी झंडी कहीं और मिल रही होगी। वहां जो घटिया निर्माण हो रहा था, उसकी कागजों में हकीकत कुछ और होगी। भ्रष्ट तंत्र की विशेषता यह होती है कि कोरोना संक्रमण की तरह खुद कभी नहीं सोचता कि वह भी भ्रष्टाचार में कभी फंस सकता है। वह मानकर चलता है कि बंदरबांट का पीपीई किट उसे किसी भी दंड से बचा लेगा।
मुराद नगर मामले में भी आगे क्या होता है, यह देखने की बात है, क्योंकि श्मशानघाट के लेंटर तले अगर बड़े लोगों के हाथ भी दबे मिले तो 25 लोगों की असमय मौत पर स्यापे के अलावा शायद ही कुछ हो। इस पूरे मामले को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। इस देश में कुल कितने श्मशानघाट हैं, इसका कोई एकजाई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी 2011 की जनगणना को आधार मानें तो देश में 6 लाख 64 हजार से अधिक गांव और करीब 8 हजार शहर/कस्बे हैं। औसतन हर गांव में एक और हर शहर में चार श्मशान घाट भी मानें तो इनकी संख्या करीब 7 लाख के लगभग होती हैं। इनका कोई व्यापक सर्वे हुआ हो, इसकी भी जानकारी नहीं है।
गांवों के अधिकांश श्मशान घाटों पर एकाध शेड के अलावा कुछ नहीं होता। लेकिन शहरी व कस्बे के श्मशान घाटों के सौंदर्यीकरण और उन्हे सुविधा सम्पन्न बनाने के दृष्टि से शोक सभा हॉल, शवदहन के लिए शेड व ईंधन सामग्री रखने के लिए भी भवन बनाए जाने लगे हैं। कई जगह ये निर्माण कार्य श्मशान घाट प्रबंधन समितियां या फिर धर्मार्थ संस्थाएं करवाती हैं तो अनेक स्थानों पर यह दायित्व नगरीय निकाय या पंचायतों का होता है।
मुराद नगर हादसे का सबसे बड़ा सबक तो यही है कि अब हमे अपने श्मशान घाटों का सुरक्षा ऑडिट भी कराना जरूरी है और यह ऑडिट सरकारी न होकर किसी तीसरी विश्वसनीय एजेंसी के जरिए कराना चाहिए। कम से कम इतना भरोसा तो बना रहे कि अंतिम विदाई देने के बाद व्यक्ति 'शुद्धि' के लिए ही सही, सुरक्षित घर तो लौट सके। श्मशान घाट मृतकों की अंत्येष्टि का स्थान ही रहें, जीवितों की समाधि का नहीं।