फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ये हैं पर्यावरण के प्रहरी, पर चुनौतियां फिर भी कम नहीं

Tue, 06 Jun 2017 09:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
पर्यावरण प्रेमी कर्ण सिंह
विज्ञापन
विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर हम आपको सुना रहे हैं, पर्यावरण के ऐसे प्रहरियों की कहानियां, जिन्होंने अपना जीवन ही पर्यावरण को समर्पित कर दिया है।
विज्ञापन


कर्ण सिंह ने दूषित पानी किया साफ
वन विभाग के अधिकारी कर्ण सिंह ऐसे व्यक्तियों के रूप में जाने जाते हैं, जो सरकारी सीमाओं से आगे जाकर काम करते हैं। वह पर्यावरण और जीव-जंतु से संबंधित तथ्यों के चलते फिरते नॉलेज बैंक हैं। चाहे मेडिसिन प्लांट की जानकारी लेनी हो या फिर किसी जीव के बारे में पूछना हो तो शहर में उनसे बेहतर कोई दूसरा जानकार नहीं हो सकता। 37 साल के कैरियर में उनके पास कई उपलब्धियां रही हैं। उनका सबसे बड़ा काम सुखना में गिर रहे कांसल के दूषित पानी को रोकना रहा है।

कांसल गांव के दूषित पानी ने न सिर्फ 18-20 एकड़ फॉरेस्ट को बरबाद कर दिया बल्कि यह रॉक गार्डन के पिछले हिस्से को अपनी गिरफ्त ले रहा था। कर्ण सिंह ने अपने अनुभव के आधार पर दूषित पानी को न सिर्फ देसी नुस्खे से साफ किया बल्कि उसके रुख को भी मोड़ दिया। नियमों के मुताबिक दूषित पानी को ट्रीट करने के बाद उसका बीओडी लेवल (बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड) 10 होना चाहिए, लेकिन कर्ण सिंह ने जिस तरह से पानी साफ किया है, उसका बीओडी लेवल 6-7 रिकार्ड किया गया है।
विज्ञापन


इनकी इस उपलब्धि पर चंडीगढ़ प्रशासन ने उन्हें 26 जनवरी को सम्मानित भी किया था। सेक्टर 26 स्थित बटरफ्लाई पार्क को विकसित करने में भी उनका अहम रोल रहा है। साल 2006-07 को पीयू के एक्सपर्ट टीम ने साफ मना कर दिया था कि तितलियों के लिए अनुकूल माहौल नहीं है। इसलिए तितलियों का यहां रह पाना मुश्किल होगा। इस चुनौती को कर्ण सिंह ने स्वीकार किया और तितलियों को लाने के लिए जुट गए।

इसके लिए उन्होंने तितलियों को आकर्षित करने के लिए एजेरेटम नाम के पौधे लगाए। नमकीय रेत वाली मिट्टी लाए। इनकी मेहनत का नतीजा यह हुआ है कि आज बटरफ्लाई पार्क में 40 से ज्यादा तितलियों की प्रजातियां हैं। कर्ण सिंह ने सेक्टर 34 स्थित पीकॉक पार्क और सुखना वाइल्ड लाइफ सेंचुरी को भी विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है। कर्ण सिंह कहते हैं कि ये सब डिपार्टमेंट के सीनियर अधिकारियों के वजह से हुआ है। उन्हीं के देखरेख में वह काम करते हैं और उन्हीं के बताए कामों को वे आगे बढ़ाते हैं।

राहुल री-प्लांट कर देते हैं पौधों को नया जीवन

पर्यावरण प्रेमी राहुल महाजन
व्यापारी राहुल महाजन ऐसे शख्स हैं, जिनकी आते-जाते नजर पेड़ों पर ही रहती है। यदि किसी पेड़ पर दीमक लगा हो वे खुद ही दवा डालते हैं। अगर कोई पेड़ गिरने वाला है तो प्रशासन को अवगत कराते हैं। यदि कोई हरा-भरा पेड़ जड़ से उखड़ गया हो तो वे उसे री-प्लांट करते हैं। महाजन अभी तक शहर में कुल 70 पेड़ों को री प्लांट कर चुके हैं, जिनमें से 36 पेड़ प्रशासन के हैं।

महाजन ने अपने दम पर ही गिरे पेड़ों को री-प्लांट कर उन्हें न सिर्फ नया जीवन दिया बल्कि लोगों व प्रशासन के सामने एक आइडिया भी दिया कि पेड़ों को दोबारा से जिंदा किया जा सकता है। पर्यावरण प्रेमी राहुल महाजन ने बताया कि सोमवार को वह सेक्टर-46 के सरकारी मॉडल स्कूल में तीन और पेड़ एक जगह से हटाकर री प्लांट कर रहे हैं। महाजन के हौसले से प्रभावित होकर नगर निगम के बागवानी विभाग ने दो पेड़ री प्लांट किए हैं।

महाजन अब चंडीगढ़ के स्टेट फ्लावर पलाश की लड़ाई लड़ रहे हैं। चंडीगढ़ में पलाश विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। राहुल ने अब पलाश के पौधे लगाने शुरू कर दिए हैं। महाजन का कहना है कि वह दो हजार पौधे इस साल लगाएंगे इसके लिए वह स्कूली बच्चों की भी मदद ले रहे हैं ताकि बच्चों में हरियाली बचाने के लिए जागरूकता आ सके। पर्यावरण प्रेमी राहुल ने पहला री प्लांट पेड़ साल 2015 में सितंबर माह में किया था, उस समय सेक्टर-7 चौक के साथ एक विशाल और कई साल पुराना पेड़ गिर गया था।

प्रशासन ने इसे काटकर स्टोर में भेजने का निर्णय लिया लेकिन महाजन ने री प्लांट करने का सुझाव दिया। उस समय अधिकारी मानने को तैयार नहीं थे कि गिरा और मरा हुआ पेड़ भी जिंदा हो सकता था लेकिन महाजन ने ठानी और अपने खर्चे पर री प्लांट किया। अब यह पेड़ सेक्टर-26 के चौक के पास लगा है जिस पर हरे रंग की पत्तियां भी आ गई हैं। महाजन कहते हैं कि डिपार्टमेंट एक पेड़ के बदले 5 पौधे लगाने का दावा करते हैं, जबकि पुराने पेड़ों की देखभाल नहीं की जा रही। उनका कहना है कि एक पौधे को पेड़ बनने में कई साल लग जाते हैं जबकि री प्लांट पेड़ एक से दो साल में फिर से हरा भरा हो जाता है।

पक्षियों को बचाना इनका एक मात्र मकसद है

चंडीगढ़ बर्ड्स क्लब
पक्षियों की बात हो और चंडीगढ़ बर्ड्स क्लब की चर्चा न की जाए, ऐसा तो हो नहीं सकता। शहरवासियों में माइग्रेट और रेजिडेंट बर्ड्स के प्रति जागरूकता का श्रेय क्लब को ही जाता है। क्लब की स्थापना साल 2004-5 में हुई थी। क्लब का मुख्य मकसद पक्षियों की जनगणना, हैबिडेट की स्टडी करना, स्कूली बच्चों को पक्षियों और उनके रहन-सहन के बारे में बताना और पक्षियों रहने के लिए बिगड़ रहे माहौल से सरकार व प्रशासन को अवगत कराना है।

बर्ड्स के सदस्य हर साल सुखना में आने वाले माइग्रेंट पक्षियों की गणना करते हैं। इससे पता चलता है कि सुखना में आने वाले पक्षियों की संख्या कम हो रही है या बढ़ रही है। क्लब के पास सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने चंडीगढ़ में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों की खोजबीन की और उनके बारे में जानकारी हासिल कर लोगों को बताया। दो साल पहले चंडीगढ़ और आसपास के गांवों के हर घर में जाकर लोगों को पक्षियों के लिए घर के बाहर पीने का पानी रखने की बात कही।

इसका असर यह है कि आज भी गांव के लोग पक्षियों के लिए पानी रख रहे हैं। बर्ड्स क्लब के अध्यक्ष प्रोफेसर एमएस सेखों ने बताया कि बर्ड्स क्लब के सदस्य समय-समय पर स्कूलों और कालेजों में जाकर बच्चों को पक्षियों को बारे में जागरूक करते हैं। बर्ड्स क्लब के 37 लाइफ टाइम सदस्य हैं, जबकि 250 से ज्यादा पूरे देश से सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े हैं। सेखों कहते हैं कि उनके सदस्य पक्षियों के लिए बिगड़ रहे माहौल के खिलाफ लड़ाई लड़ते हैं।

मोटेमाजरा पक्षियों के लिए एक  बेहतरीन पनाहगार है, लेकिन पिछले कई महीनों से माहौल बिगड़ रहा है। इसके लिए बर्ड्स क्लब के सदस्य लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके बारे में गमाडा, पंजाब सरकार और फारेस्ट डिपार्टमेंट के बराबर संपर्क में हैं और उनसे मिलकर वहां पर पक्षियों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की कोशिश में जुटे हैं। बर्ड्स क्लब हर साल बर्ड रेस भी आयोजित करवाता है। इसके अलावा क्लब के सदस्य दूसरे शहरों में जाकर स्टडी करते हैं।

ये शख्स जन्मदिन व समागम में बांटते हैं पौधे

पर्यावरण प्रेमी शिंदर पाल सिंह
शहर के युवा पार्षद शिंदर पाल सिंह बॉबी कंबोज न सिर्फ लोगों की आवाज उठाते हैं बल्कि पर्यावरण को बचाने की भरसक कोशिश में जुटे हैं। अपने दम पर उन्होंने मोहाली में दो हजार से अधिक पौधे लगए हैं। एक संस्था बनाकर पूरे पंजाब में पौधे बंटवा रहे हैं। जन्मदिन व समागम के मौके पर वह पौधे गिफ्ट करते हैं। सेक्टर 68 के पार्षद शिंदर पाल सिंह शहीद उधम सिंह एजुकेशन एंड चेरीटेबल ट्रस्ट के संस्थापक भी हैं।

करीब तीन साल पहले मोहाली में पौधे लगाने की शुरुआत की थी। सेक्टर 68 में काफी संख्या में रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के साथ मिलकर पार्को पर पौधे लगाए, जिसके बाद इनकी देखभाल वह और इलाके के लोग अब तक कर रहे है। बोबी ने बताया कि करीब दो हजार के आसपास पौधे उनके द्वारा सेकटर 68 के तकरीबन सभी पार्को में लगाए गए थे। जिनमें से कई अब बड़े हो चुके हैं। 

इस दौरान उन्होंने ट्रस्ट के सदस्यों के साथ मिलकर पूरे पंजाब भर में पर्यावरण को बचाने के लिए पौधे लगाने की मुहिम शुरू कर रखी है, जो कि अभी तक जारी है। इस मुहिम के तहत ट्रस्ट के पंजाब के अलग अलग शहरों मेें रहते सदस्यों को वह पौधे लगाकर इनकी देखभाल करने के लिए जागरूक भी करते हैं। यहीं नहीं ट्रस्ट की ओर से फेज 3ए में स्थित शहीद उधम सिंह भवन में भी कई तरह के पौधे लगाए हुए हैं, जिनकी देखभाल वह खुद करते हैं। बोबी का कहना है कि हमारे जीवन में पेड़ पौधे खास महत्व रखते हैँ इसलिए अगर हमें पर्यावरण को बचाना है कि तो पौधे जरूर लगाए और इनकी देखभाल भी करें।

एक लाख 85 हजार पेड़ बढ़ा रहे चंडीगढ़ की शोभा

विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : Demo pic
ग्रीन और क्लीन सिटी का खिताब प्राप्त सिटी ब्यूटीफुल में एक लाख 85 हजार 597 पेड़ हैं, इनमेँ 20 हजार पेड़ ऐसे हैँ जो कि प्रशासन के एरिया में आते हैं। प्रशासन और नगर निगम के बागवानी विभाग ने हाल ही में शहर में लगे पेड़ों की गणना की है।

सबसे हर भरा सेक्टर-27
शहर में सबसे हरा भरा सेक्टर-27 है यहां पर कुल 5797 पेड़ हैँ जबकि इसके बाद सेक्टर-36 में 4445 पेड़ मिले हैं। जबकि सबसे कम पेड़ सेक्टर-6 में मिले हैं यहां पर कुल 147 पेड़ हैं।

नगर निगम के एरिया में इतने पेड़ शहर में
पेड़------------------------संख्या
ग्रीन पेड़-------------------124538
मरे और सूखे हुए पेड़-----------1029
खतरनाक पेड़------------------262
ग्रीन छोटे पेड़ और पौधे----------39768
कुल-------------------------165597

चंडीगढ़ को इन चुनौतियों से निपटना जरूरी

विश्व पर्यावरण दिवस पर एलांते मॉल में किड्स कार्निवाल - फोटो : अमर उजाला
हरियाली के लिए मशहूर चंडीगढ़ के सामने बढ़ते वाहन, पॉलिथीन और ई-वेस्ट एक चुनौती के तौर पर उभर कर सामने आ रहा है। बढ़ते वाहन से जहां पॉल्यूशन बढ़ रहा है। वहीं जुर्माने के बावजूद पॉलिथीन पर रोक नहीं लग पा रही। ई-वेस्ट के प्रति जागरुकता की कमी एक समस्या के तौर पर उभरकर सामने आ रही है।

14 लाख वाहनों से बढ़ रहा प्रदूषण
शहर में बढ़ रहे प्रदूषण के स्तर का एक मुख्य कारण सड़कों पर बढ़ रहे वाहनों की संख्या है। जानकारी के मुताबिक शहर में इस समय करीब 14 लाख दुपहिया व चार पहिया वाहन शामिल हैं। इसकेअलावा शहर में रोजाना पड़ोसी राज्यों से आने वाले वाहनों की संख्या में इजाफा हुआ है।

ट्रिब्यून चौक से रोजाना डेढ़ से दो लाख वाहन गुजरते है। इससे हर साल आरएसपीएम में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2010 में आरएसपीएम 86 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर, 2011 में 87, 2012 में 100, 2013 में 94, 2014 में 79, 2015 में 81 और वर्ष 2016 में 93 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर आरएसपीएम दर्ज किया गया।

ई वेस्ट को रिसाइकिल करना मुश्किल

मोबाइल
कंप्यूटर, स्मार्टफोन, लैपटॉप व अन्य आधुनिक यंत्र के ई वेस्ट का बुरा असर पर्यावरण पड़ रहा है। लोग इससे पूरी तरह अंजान है। प्रशासन ई वेस्ट पर लोगों को जागरूक नहीं कर पा रहा है।

यहां की आईटी कंपनियां प्रत्येक वर्ष 1000 से 1200 करोड़ रुपये का साफ्टवेयर और आईटी सर्विसेज दूसरे देश में निर्यात कर रही है। पिछलें कुछ सालों में ई वेस्ट में भी इजाफा हुआ है। चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा  ई वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर वर्ष 2011 में भी पॉलिसी भी बनाई गई। 

चंडीगढ़ में प्रति वर्ष 10 हजार टन तक ई वेस्ट जनरेट हो रहा है। जिसमें से करीब 6 हजार टन ई वेस्ट हर साल रिसाइकिल किया जा रहा है, वहीं 4 हजार टन तक ई वेस्ट हर साल डंप किया जाता है।

 
विज्ञापन

पॉलिथीन व प्लास्टिक वेस्ट पर कैसे लगे रोक

पॉलिथीन और प्लास्टिक का इस्तेमाल - फोटो : amar ujala
पर्यावरणविद् मानते हैं कि पॉलिथीन पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी दुश्मन है। एनजीटी आदेश दे चुका है कि पॉलिथीन के इस्तेमाल पर पांच हजार रुपये जुर्माना लगाया जाए। इसके बावजूद चंडीगढ़ प्रशासन पॉलिथीन के इस्तेमाल को नहीं रोक पाया है। मंडियों में धड़ल्ले से पॉलिथीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। ये पॉलिथीन इस्तेमाल होने के बाद नालियों, मैदान और पशुओं के पेट में जाते हैं।

पॉलिथीन से मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम होती जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि प्लास्टिक कचरे के जमीन में दबने की वजह से वर्षा जल का भूमि में संचरण नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप भूजल स्तर गिरने लगता है। पॉलिथीन एक पेट्रो-केमिकल उत्पाद है, जिसमें हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होता है। रंगीन पॉलिथीन मुख्यत: लेड, ब्लैक कार्बन, क्त्रसेमियम, कॉपर आदि के महीन कणों से बनता है, जो जीव-जंतुओं व मनुष्यों सभी के स्वास्थ्य के लिए घातक है।

बाजार में पॉलिथीन के कई विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन प्रशासन उन पर काम नहीं कर रहा। जूट से बने कैरीबैग्स, कागज के कैरीबैग और रिसाइकिल पॉलिथीन के कैरी बैग्स भी उपलब्ध है। लेकिन इनकी लागत ज्यादा होने के कारण, इनका प्रयोग कम हो रहा है। इसमें लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें