खारकीव मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए जालंधर के तीन विद्यार्थी जतिन सहगल, अनिकेत शर्मा और अजय आहुजा ने पिसोचिन पहुंचकर अपने परिजनों से बात की। उन्होंने बताया कि रूस की ओर से खारकीव में फंसे भारतीय छात्रों को निकालने का समय दोपहर बाद मिला लेकिन भारतीय दूतावास के प्रयासों से बंकरों में छिपे बच्चों ने सुबह सवा छह बचे निकलना शुरू कर दिया। जब बंकरों से निकले तो चारों-तरफ सन्नाटा था। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सभी लोग रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे। खाने-पीने के लाले पड़े थे और हालात भी बिगड़ रहे थे तो वे अन्य बच्चों के साथ निकल पड़े।
वर्ष 2020 सत्र के लिए ये तीनों दोस्त एक साथ गए थे और खारकीव में हॉस्टल में रूममेट भी थे। छात्रों ने परिजनों से बात के दौरान कहा कि उन्हें तीन मार्च को तड़के निकलने की एडवाइजरी मिली तो वह सामान पैक कर निकल पड़े। पहला लक्ष्य स्टेशन पहुंचकर ट्रेन पकड़ना और सुरक्षित स्थान पर पहुंचना था तो वह सुबह सवा छह बजे बंकर से निकल स्टेशन पहुंचे।
स्टेशन पर हजारों की संख्या में यूक्रेन नागरिक व अन्य देशों के छात्रों का जमघट था। पैर रखने की जगह नहीं थी। स्टेशन पर यूक्रेन पुलिस बड़ी संख्या में मौजूद थी। जैसे ही वह ट्रेन पर चढ़ने लगे तो उन्हें रोक दिया गया और पहले यूक्रेन के नागरिकों को तवज्जो दी गई। बाद में अन्य देशों के छात्रों में पहले लड़कियों/महिलाओं को ट्रेन में चढ़ने दिया गया। देखते-देखते तीन ट्रेनें निकल गईं। जब उनकी बारी आई तो ट्रेनें फुल हो चुकी थीं जब उन्होंने ट्रेनों के अंदर घुसने की कोशिश की तो स्थानीय पुलिस ने हवाई फायरिंग की।
इसके बाद उन्हें सूचना दी गई कि शाम छह बजे तक खारकीव छोड़ना है तो वह पैदल ही वहां से निकल पड़े। वह तीन घंटे पैदल चलने के बाद खारकीव से 15 किलोमीटर दूर पिसोचिन में भारतीय दूतावास के कैंप में पहुंचे लेकिन धमाकों की गूंज के डर से अब दोबारा से बंकरों में छिपना पड़ा है। यूक्रेन के खारकीव में जालंधर के अनिकेत शर्मा पुत्र हेमंत शर्मा, जतिन सहगल पुत्र राजन सहगल व अजय आहुजा पुत्र संजीव आहुजा 24 फरवरी से खारकीव में बंकरों में रात गुजार रहे थे।