सदन अफसोस जाहिर करता है कि भारत सरकार ने नए कृषि कानूनों ‘किसानी फसल व्यापार और वाणिज्य (उत्साहित करने और आसान बनाने) एक्ट’ 2020, ‘जरूरी वस्तुएं (संशोधन) एक्ट’ 2020 और ‘किसानों के (सशक्तीकरण और सुरक्षा) कीमतों के भरोसे और खेती सेवाओं संबंधी करार एक्ट’ 2020 के विरुद्ध किसान आंदोलन से पैदा हुए मौजूदा संकट को न तो हल किया है और न ही भारत के राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान की धारा 254 (2) के अंतर्गत 20 अक्तूबर, 2020 को पास संशोधन बिलों, किसान फसल, व्यापार और वाणिज्य (उत्साहित करने और आसान बनाने) (विशेष उपबंध और पंजाब संशोधन) बिल -2020, ‘किसानों के (सशक्तीकरण और सुरक्षा) कीमत के भरोसो संबंधी करार और खेती सेवाओं (विशेष उपबंध और पंजाब संशोधन) बिल-2020 और जरूरी वस्तुएं (विशेष व्यवस्थाएं और पंजाब संशोधन) बिल-2020 और ‘दा कोड आफ सिविल प्रोसीजर (पंजाब संशोधन) बिल-2020 को सहमति दी है।
इस निष्पक्ष और गैर-जिम्मेदाराना रवैये ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है और किसानों में बेचैनी और गुस्सा बढ़ा है जो नए केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में न सिर्फ बड़ी संख्या में किसानों और खेत कामगारों का जीवनयापन बुरी तरह प्रभावित हुआ है बल्कि राज्य में कारोबार, व्यापार और उद्योग को भी बड़े घाटे का सामना करना पड़ा है।
यहां तक कि अब तक 125 किसानों और खेत कामगारों की जानें भी चलीं गई। भारत सरकार के इस पक्षपाती और अनुचित रवैये के नतीजे के तौर पर किसान इन नए कानूनों को रद्द करने की मांग पर डटे हैं। सदन यह प्रस्ताव करता हुआ, एक बार फिर भारत सरकार को किसानों और राज्य के बड़े हितों के मद्देनजर बिना शर्त यह कानून वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आधारित अनाज की खरीद की मौजूदा प्रणाली को जारी रखने की अपील करता है।