हरियाणा सेवा का अधिकार आयोग ने निर्धारित समय में मृत्यु प्रमाण पत्र जारी न करने से जुड़े मामले में गलतबयानी पर पीजीआई रोहतक के पूर्व निदेशक डॉ. रोहतास यादव से जवाब मांगा है। साथ में पांच डॉक्टरों को स्वत: संज्ञान नोटिस भेजा है। आयोग की सचिव मीनाक्षी राज ने कहा कि केस में जिन-जिन अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही पाई जाएगी, उन्हें नोटिस देंगे।
यह जीवित व्यक्तियों की मानवीय संवेदनाओं के मृत होने का जीवंत उदाहरण है। फाइलों को लंबित रखने के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार डॉक्टर अजय, अंजलि, पेमा, साक्षी और अमरनाथ को अभी नोटिस भेजे हैं। इनकी मेल आईडी और मोबाइल नंबर मांगे हैं, उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी नोटिस जारी किए जाएंगे।
आयोग ने पूछा है, क्यों न उन पर सेवा का अधिकार अधिनियम, 2014 के अनुसार समय पर सेवा न देने के लिए उन पर 20-20 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जाए। इसके अलावा मृत्यु प्रमाण पत्र के 125 लंबित मामलों के बारे में जानकारी मांगी है कि वे डीसी या सिविल सर्जन कार्यालय को किस तारीख को भेजे थे। डीसी और सिविल सर्जन को इसकी पुष्टि करने के लिए कहा गया है कि क्या ये मामले उनके कार्यालयों में प्राप्त हुए और उन पर क्या कार्रवाई की गई।
86 मामलों में अभी प्रमाण पत्र जारी नहीं
मीनाक्षी राज ने बताया कि गत 24 अक्तूबर को संस्थान के निदेशक ने स्वीकार किया है कि 125 मामलों में से 86 मामलों में अभी तक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं किए गए हैं। यह पीजीआई के पूर्व निदेशक डॉ. रोहतास यादव के 11 अक्तूबर को आयोग के समक्ष दिए बयान के एकदम विपरीत है। उन्होंने कहा था कि संस्थान में प्रमाण पत्रों का कोई मामला लंबित नहीं है। तथ्यों को सत्यापित करने के लिए, पीजीआई की वर्तमान निदेशक डॉ. गीता के साथ टेलीफोन पर बात की गई। उन्होंने 24 अक्तूबर को भेजी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि मृत्यु से संबंधित जिन 125 फाइलों के पंजीकरण में देरी हुई, उनमें से 107 फाइलें कोविड-19 अवधि की हैं। गैर-कोविड अवधि के 18 मामलों में से ज्यादातर 2019 के हैं, जिनमें देरी हर स्तर पर व्यवस्थित जांच की विफलता के कारण हुई।
पांच डॉक्टरों की जांच रिपोर्ट धोखा देने वाली
मीनाक्षी राज ने बताया कि 24 अक्तूबर के पत्र के साथ संलग्न पांच डॉक्टरों की हस्ताक्षरित जांच रिपोर्ट धोखा देने के अलावा और कुछ नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 2019 में हुई मृत्यु के मामलों में दो साल के बाद भी प्रमाण पत्र जारी नहीं किए। इन 17 मामलों में से 6 में आयोग के हस्तक्षेप के बाद बीते 10 सितंबर को दो साल से भी अधिक समय के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए गए। 11 मामलों में मृत्यु प्रमाण पत्र आज भी लंबित हैं।