मेरा रहन-सहन, खान-पान और बोली मुझे सभी राज्यों से अलग बनाती है। पंचकूला अघोषित राजधानी के तौर पर विकसित हुआ है। हालांकि, मुझे अपनी राजधानी, हाईकोर्ट और विधानसभा नसीब नहीं हुई। एसवाईएल के पानी का इंतजार है। इनके लिए प्रयास तो खूब हुए पर बात बन नहीं पाई। अलग विधानसभा बनाने का मामला विचाराधीन है। उम्मीद है भविष्य में नया भव्य विधानसभा भवन चंडीगढ़ में बनकर तैयार होगा।
‘देसां में देस हरियाणा, जित दूध-दही का खाणा’ यहां की प्रचलित कहावत है। हालांकि, दूध-दही व अन्य सेहतमंद खानपान के बावजूद कुछ समय से नशाखोरी कलंकित कर रही है। युवा पीढ़ी हेरोइन, अफीम, स्मैक व चिट्टा की आदी होने लगी है। पंजाब से लगते जिलों में नशे का प्रकोप ज्यादा है। वक्त के साथ-साथ सियासी करवटें भी बदलती रहीं। छोटा सा प्रदेश अपने राजनीतिक घटनाक्रमों के लिए कई बार सुर्खियों में रहा। बीते कुछ वर्षों में मेरे दामन पर जाट आरक्षण आंदोलन, करौंथा आश्रम प्रकरण, पंचकूला हिंसा के दाग लगे हैं। मैं वर्तमान में अपने इतिहास का सबसे बड़ा किसान आंदोलन देख रहा हूं।
दल-बदल की राजनीति के लिए पहचान
मिसाल के तौर पर आया-राम, गया-राम के रूप में दलबदल की राजनीति के लिए हरियाणा पूरे देश में पहचाना गया। 1967 में गया लाल पलवल की हसनपुर विधानसभा से विधायक चुने गए। उन्होंने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली। पहले उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा। फिर थोड़ी देर में कांग्रेस में वापस आ गए। करीब 9 घंटे बाद उनका हृदय परिवर्तन हुआ और एक बार फिर जनता पार्टी में चले गए। उसके बाद वापस कांग्रेस में आए। तब तत्कालीन कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह उन्हें लेकर चंडीगढ़ पहुंचे और मीडिया से रू-ब-रू होते हुए कहा कि गया राम अब आया राम हैं। इसके बाद दलबदलुओं के लिए आया राम, गया राम इस्तेमाल होने लगा।
पंजाब व हरियाणा का हाईकोर्ट अब तक संयुक्त है। छोटे राज्य होने के बावजूद सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड, झारखंड, मणिपुर, मेघालय, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश आदि के अपने अलग हाईकोर्ट हैं। अनेक बार मांग उठी, प्रदेश सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भी भेजे लेकिन बात बनी नहीं। दक्षिण हरियाणा में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में है।
एसवाईएल पर पंजाब नहीं मान रहा
सतलुज यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) विवाद अब भी बरकरार है। पंजाब अपने पड़ोसी हरियाणा को नहर का पानी देने के लिए नहीं मान रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नहर निर्माण के लिए पंजाब ने इंकार कर दिया। केंद्र सरकार मध्यस्थता कर रही लेकिन पंजाब टस से मस नहीं हो रहा। पंजाब से हिस्से का पानी न मिलने के कारण हरियाणा का दक्षिणी हिस्सा गंभीर जल संकट झेलता आ रहा है। पंजाब ने तो अपने हिस्से में बनी नहर मिट्टी से भर दी है।
1923 में लाहौर में उठी हरियाणा को लेकर मांग
हरियाणा को अलग राज्य बनाने की मांग सबसे पहले 1923 में स्वामी सत्यानंद ने लाहौर (पाकिस्तान) में उठाई थी। इसके बाद दीनबंधु छोटूराम की अध्यक्षता में मेरठ में ऑल इंडिया स्टूडेंट कॉन्फ्रेंस में हरियाणा को अलग राज्य बनाने की मांग रखी गई। देशबंधु गुप्ता, पंडित नेकीराम शर्मा और पंडित श्रीराम शर्मा ने भी राज्य के गठन के लिए प्रयास किए। 1952 में पहले आम चुनाव हुए, जिनमें हरियाणा क्षेत्र से चौ. देवीलाल सहित कांग्रेस के 38 विधायक चुने गए।
अलग राज्य बनवाने के लिए चौ. देवीलाल व चौ. चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा क्षेत्र से 125 विधायकों का हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री जीबी पंत को दिल्ली में दिया। 1953 में चौ. देवीलाल ने भारत सरकार द्वारा बनाए गए राज्य पुनर्गठन आयोग के सामने अलग हरियाणा राज्य बनाने की मांग रखी।
1955 में अकाली नेताओं ने धर्म के आधार पर पंजाब को बांटने की मांग की। केंद्र सरकार ने संसदीय समिति की सिफारिशों को सैद्धांतिक आधार पर स्वीकार कर लिया। 23 अप्रैल 1966 को अलग राज्य के गठन के लिए पंजाब सीमा आयोग का गठन किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 12 जून, 1966 को रेडियो पर हरियाणा को अलग राज्य बनाने की घोषणा की। 7 सितंबर 1966 को संसद में विधेयक पारित हुआ, 18 सितंबर को राष्ट्रपति ने गठन को मंजूरी दी। पहली नवंबर 1966 को हरियाणा अस्तित्व में आया।