खालरा ने एक प्रेस नोट में सार्वजनिक रूप से खुलासा किया था कि उन्होंने अमृतसर, तरनतारन और मजीठा में तीन श्मशानों से 2000 से अधिक अवैध दाह संस्कार के सबूत एकत्र किए थे। तब सुप्रीम कोर्ट ने दाह-संस्कार के तीन मामलों तक सुनवाई सीमित कर दी थी और बाकी मामले कार्रवाई के दायरे से बाहर हो गए थे।
इस मामले में जांच सीबीआई को सौंपी गई थी और गुप्त दाह संस्कार से लगभग 1528 व्यक्तियों की पहचान हुई थी। सीबीआई ने कुछ मामलों में आरोप पत्र दायर किया था जिसमें पंजाब पुलिस के कई अधिकारियों को हत्या और अन्य अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। याची ने दावा किया कि उन्होंने जानकारी जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है और तीन श्मशान घाटों के बाहर अवैध दाह-संस्कार के आंकड़ों को शामिल किया है। इसके साथ ही पंजाब के 26 जिलों व ब्लॉक से जानकारी ली गई है।
याचिकाकर्ता ने आठ साल मेहनत कर उस दौरान हुई हत्याओं को लेकर आंकड़े एकत्रित किए हैं। सरकारों की इस दलील कि अज्ञात पीड़ितों की पहचान नहीं की जा सकी, याची के संगठन की ओर से 75 प्रतिशत से अधिक पीड़ित की पहचान की गई (अमृतसर में 2067 दाह संस्कारों में से लगभग 1527)।
लापता हुए युवाओं को लेकर जांच जरूरी
पंजाब में आतंकवाद के दौरान 1984 से 1994 के बीच गायब हुए पंजाब के युवाओं के मामले की जांच का आदेश जारी करने की याचिका में अपील की गई है। याची संस्था की ओर से बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। सीबीआई ने 1996 में अपनी रिपोर्ट पेश कर बताया था कि 1984 से लेकर 1994 के बीच सिर्फ तरनतारन और अमृतसर के श्मशान घाटों में ही अवैध तरीके से 984 लोगों का संस्कार किया गया था। इस मामले में महज दो प्रतिशत पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों को ही दोषी करार दिया गया है। अगर राज्य के सभी श्मशान घाटों से उस दौरान की जानकारी जुटाई जाए तो कई अन्य मामलों का खुलासा हो सकता है।