प्रो. लाल बचपन की घटना याद करते हुए बताते हैं कि वह मदरसे में एक शीशम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। तब उन्होंने दूर से आते देखा कि कुछ पठान घोड़ों पर सवार होकर गांव की तरफ बढ़ रहे हैं, वह रास्ते में महिलाओं और बच्चों को लेकर आ रहे थे। कुछ पठानों के हाथों में बंदूकें, तलवारें और भाले भी थे। जैसे ही उन्होंने पठानों को गांव की तरफ आते देखा तो उन्होंने शोर मचा दिया कि पठान आ गए।
मदरसे में पढ़ने वाले सभी बच्चे गांव की तरफ भाग गए। वह भी छोटी दीवार फांदकर घर में दाखिल हुए और मां को पठानों के आने की बात कही। पिता व्यापार के सिलसिले में बाहर गए थे। मां उन्हें और परिवार के अन्य पांच-भाई बहनों को लेकर घर की दीवार फांदकर गली में भाग गई। वहां गांव के ही एक मुसलमान परिवार ने घरों में मिट्टी के बने अनाज के भड़ोलों में छिपा दिया।
गांव में आकर पठानों ने अलग-अलग घरों की तलाशी ली। लेकिन भड़ोलों में उन्हें नहीं ढूंढ पाए। सारी रात वह उसमें ही छिपे रहे। अगले दिन गांव में पुलिस पहुंची। पुलिस ने सभी को वहां से निकाला और कहा कि जो हिंदू-सिख परिवार भारत जाना चाहते हैं, वह उनके साथ गांव के बाहर ग्राउंड में आ जाएं। सुबह तक पिता भी सारा काम बीच में छोड़कर घर आ गए थे। उनके समेत वहां तीन चार हिंदू परिवारों के 17 सदस्य थे। उन्हें पहले तांगों पर बिठाकर पुलिस ने गुजरात भेजा, वहां छह-सात दिन फौज के कैंप में रखा। वहां से गोरखा रेजिमेंट आर्मी ट्रकों में बिठाकर गुजरांवाला लेकर आई। वहां से ट्रकों में बिठाकर अमृतसर लाया गया।
अमृतसर में तब सबसे अधिक शरणार्थियों के कैंप थे। हमारा परिवार भी हाल गेट के बाहर अन्य परिवारों के साथ तीन चार दिन बैठा रहा। वहां पुलिस और शहर के लोग खाना आदि मुहैया करवाते रहे। फिर उन्होंने सभी से कहा कि जो भी घर आप को खाली मिले और पसंद हो, वहीं आप रिहायश बना लें।
यहां मुसलमानों के बहुत सारे घरों में आग लगा दी गई थी। अमृतसर में ही गंज की मोरी इलाके में एक घर, जो बाहर से ठीक दिखाई देता था और अंदर से पिछला काफी हिस्सा आग से क्षतिग्रस्त हो चुका था। यहां पिता हमें लेकर आए गए और रहने लगे। बाद में पता चला कि जिस घर में हम रहे यह घर एक मुसलमान स्वतंत्रता सेनानी डॉ. हाफिज मुहम्मद बशीर का है। जिन्होंने नौ अप्रैल 1919 को अमृतसर में आयोजित की गई रामनवमी की शोभायात्रा की अगुवाई की थी।
पहले पाकिस्तान से आई थी लाशों से भरी ट्रेन
प्रो. दरबारी लाल पुरानी घटनाओं को याद करते हुए कहते हैं कि सबसे पहले हिंदुओं और सिखों की लाशों से भरी एक ट्रेन पाकिस्तानियों ने भारत भेजी थी। इसके बाद लखनऊ से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन को भी यहां के हिंदुओं और सिखों ने सभी मुसलमानों को मारकर भेजी। जिससे नफरत का जहर दोनों मुल्कों के लोगों में और भर गया।
जब पाकिस्तान से हिंदुओं-सिखों की भरी ट्रेन भारत आ रही थी तब पाकिस्तान में एक जगह बन्नो कुहाट पर लाहौर से करीब 10 से 12 किलोमीटर दूर ट्रेन को मुस्लिम दंगाइयों ने रोककर ट्रेन में भारत आ रहे सभी हिंदुओं-सिखों का कत्ल कर ट्रेन लाशों से भर भारत भेज दी। जिसमें सिर्फ एक ड्राइवर को ही जिंदा छोड़ा गया था। जब ट्रेन अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर पहुंची और अमृतसर रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर झीनी सिंह ने देखा कि ट्रेन तो रुक गई है लेकिन कोई मुसाफिर ट्रेन से नहीं उतरा, तब उन्होंने डिब्बे देखे तो वह लाशों से भरे थे। उस ट्रेन पर लिखकर भेजा था कि गिफ्ट फ्रॉम पाकिस्तान। इस घटना की खबर आग की तरह सारे देश में फैल गई।
इसके बाद अमृतसर से अटारी जाने के लिए लखनऊ से आई ट्रेन को पुतलीघर 12 मकान के पास रोककर उसमें सवार सभी मुसलमानों की हत्या कर दी गई और जवाब में लिखकर भेजा गया कि प्रेजंट फ्रॉम इंडिया। यह दर्द की घटनाएं आज भी आंखों में पानी ले आती हैं। आज भी तब की घटनाओं के दौरान मारे गए 10 लाख निर्दोषों का दर्द असहनीय पीड़ा देता है।