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मां ने पिता बनकर पाला... संकट में परिवार संभाला, 5 बेमिसाल कहानियां

Mon, 19 Jun 2017 09:11 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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फादर्स डे
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पिता नहीं रहे तो मां ने उनका फर्ज निभाया, संकट में परिवार को संभाला और बच्चों को पिता बनकर पाला। पढ़िए ऐसी ही मिसाल पेश करती पांच कहानियां।
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कहते हैं बच्चों के लिए पिता ही उनका रोल मॉडल होते हैं। पिता बच्चों को जीना सिखाते हैं। हालात का सामना करने का हौसला जगाते हैं। देखा जाए तो पिता बरगद के उस वृद्ध की तरह होता है, जिसके नीचे उसका परिवार पलता बढ़ता है।

लेकिन असमय पिता का साया सिर से छिन जाए तो परिवार पर जो संकट आता है, इसे वही समझ सकता है, जो इसे झेलता है। ऐसे में परिवार को संभालने के लिए मां पिता की जिम्मेदारी भी निभाती है। ऐसी ही कुछ माताओं से आज आपको रूबरू करा रहे हैं।
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पति की मौत के बाद पांचों बच्चों को बनाया अफसर

फादर्स डे
सेक्टर 22 में रहने वाली आशा देवी के पति श्रीराम सेना में अफसर थे। करीब 40 साल पहले उनकी आकस्मिक मौत हो गई। उनके जाते ही आशा देवी की दुनिया सूनी हो गई। पांच बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। आशा देवी बताती हैं कि उन्होंने निश्चय किया कि वे हालातों से लड़ेंगी। पति की अंतिम इच्छा थी कि उनके बच्चे पढ़ लिखकर कामयाब बनें। आशा ने अपनी सारी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दी।

आखिर उनकी सालों की मेहनत सफल हुई और उनके पांचों बच्चे कैरियर के शिखर पर पहुंच गए। बड़ी बेटी चंद्रा डोगरा जम्मू में डाक्टर हैं। दूसरी बेटी नीलम कलसी सुप्रीमकोर्ट में एडवोकेट, तीसरी बेटी सुमनजैन भी सुप्रीमकोर्ट में एडवोकेट, चौथे नंबर पर डा. गजेंद्र दीवान हैं, जो पंजाब स्वास्थ्य विभाग में डिप्टी डायरेक्टर हैं। सबसे छोटे बेटे डा. राजीव दीवान भी डाक्टर है। उनका कालका में प्राइवेट हास्पिटल है।

डा. गजेंद्र दीवान बताते हैं कि जब वह बारहवीं में थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। वे मानते हैं कि जीवन में पिता की कमी तो है, मगर मां ने कभी महसूस नहीं होने दी। दिन रात मेहनत करके उन्होंने सभी बेटों को पढ़ाया-लिखाया। उनकी उम्र 80 साल हो गई है, लेकिन उनका वही रुटीन है, जो 40 साल पहले था। जिस तरह हम सभी बच्चों को वह सुबह उठाती थी, आज वे हमारे बच्चों को सुबह जगाती हैं।

डा. दीवान और उनके छोटे भाई डा. राजीव दीवान के बेटे हॉस्टल में रहते हैं। आशा देवी रोज सुबह फोन कर दोनों बच्चों को उठाती हैं और उनसे बातचीत करती हैं। आशा देवी ने बताया कि उनके बच्चे कभी उनके सामने नहीं रोए। इससे उन्हें हालात का सामना करने की शक्ति मिली।

पिता नहीं रहे तो मां ने संभाली उनकी जिम्मेदारी

फादर्स डे
मोहाली के सेक्टर 66 निवासी हिमांशु कालरा के पति अचानक बीमार हो गए। धीरे-धीरे बिजनेस भी ठप हो गया। दोनों बच्चों की स्कूल की पढ़ाई का खर्च, घर का किराया, बच्चों की फीस व पति की दवाईयां का खर्च उठाना हिमांशु के लिए मुश्किल हो गया, लेकिन हिम्मत ने साथ नहीं छोड़ा। घर से ही टिफिन सर्विस शुरू की। शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं। धीरे-धीरे काम चल पड़ा। घर के खर्च निकलने लगे।

दोनों बच्चों की पढ़ाई के साथ उनके देखभाल की जिम्मेदारी हिमांशु पर थी। बेटी एमबीए कर प्राइवेट कंपनी में उच्च पोस्ट पर नियुक्त हो गई है। बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है। हालांकि एक टीस उनके मन में है कि दो साल पहले उनके पति का साथ हमेशा के लिए छूट गया। बीमारी के चलते उनकी मौत हो गई थी। हिमांशु कई सालों से अपने बच्चों की परवरिश एक मां के रूप में तो कर ही रही हैं साथ ही एक पिता की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही है

हिमांशु कालरा ने बताया कि पति के गुजर जाने के बाद रिश्तेदारों ने कई सुझाव दिए। वह अच्छा खाना बनाना जानती थीं, ऐसे में उन्होंने टिफिन सर्विस शुरू करने का फैसला लिया। शुरुआत पीजी से की। बाद में सर्विस बढ़ती चली गई। आमदनी बढ़ी तो बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने में आसानी होने लगी। बेटी साहिबा कालरा को नामी यूनिवर्सिटी से एमबीए करवाई है, जो अब प्राइवेट कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है। बेटा सिमर पढ़ रहा है।

हिमांशु ने बताया इस संघर्ष की राह में उनके माता व पिता ने हर पल साथ  दिया। कभी दोनों बुजुर्ग भी बीमार पड़ जाते थे तो बहनें मददगार बन जाती थीं। उन्होंने कहा कि अब वह सोचती हैं कि उअपने पिता माता की अच्छे से सेवा करेंगी। क्योंकि उनके दोनो पेरेंट्स बुजुर्ग हैं। सभी बहने ही उनकी देखरेख करती हैं।

बेटे को कभी भी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी

फादर्स डे
जब मैं एक साल का था, तभी मेरे पिता 18 जून 1999 में कारगिल वार में देश के लिए शहीद हो गए थे। उसके बाद से मेरी मां ने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। कभी भी मुझे अपने पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। मां की  परवरिश की वजह से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा हूं। यह कहना है सेक्टर 12  पंचकूला निवासी ध्रुव गुलेरिया का। ध्रुव की मां पूनम गुलेरिया ने बताया कि जब उनके पति शहीद हुए तो एक बार लगा कि सब कुछ खत्म हो गया।

ध्रुव एक साल का था। समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी परवरिश कैसे होगी? एक पिता के बगैर बच्चे का बचपन कैसे बीतेगा। ये सोच-सोचकर परेशान हो जाती थी, लेकिन भगवान ने मुझे हिम्मत दी और ध्रुव में ही मैंने अपना जीवन उतार दिया। बेटा स्कूल जाने लायक हुआ तो आर्मी पब्लिक स्कूल ज्वाइन किया। आर्मी पब्लिक स्कूल से जुड़ने का मेरा मकसद सिर्फ इतना था कि मैं सेना से जुड़ी रहूं। क्योंकि ध्रुव के पिता दीपक भारतीय सेना को बहुत प्यार करते थे।

पूनम ने बताया कि कारगिल वार में पति के शहीद होने के बाद हिमाचल सरकार और आर्मी से वन क्लास अधिकारी के जॉब का ऑफर आया था। लेकिन ध्रुव के खातिर नौकरी नहीं की। ध्रुव बहुत छोटा था। उसे पलभर के लिए छोड़ना मेरे लिए मुश्किल था। ध्रुव कहते हैं कि हर किसी के जीवन में पिता का बहुत महत्व है। मेरी जिंदगी में पिता नहीं हैं, लेकिन मेरी मां ने उनकी कमी कभी महसूस नहीं होने दी।

पति की मौत के बाद पिता की भूमिका में आई सुचारू

फादर्स डे
साल 2013 में पति-पत्नी दोनों माथा टेकने केदारनाथ गए थे। इस दौरान आसमान से बरसी आफत के बाद फैली महामारी से पति की मौत हो गई। उसके बाद सुचारु की जिंदगी पटरी से उतर गई। ससुराल वालों ने दूरी बना ली। तीन साल के बेटे और पांच साल की बेटी को पालना व घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। घर कैसे चलेगा सोचते डर लगता था। लेकिन सुचारुने हिम्मत नहीं हारी। उसने मां और पिता दोनों का रूप लिया।

सुचारु ने बताया कि हरियाणा के एक निजी अस्पताल में फिजियोथैरेपिस्ट की जॉब शुरू की, जिससे करीब 6500 रुपये वेतना मिलता था। सुचारु ने बताया कि आज भी 2013 का वह दिन याद है, जब वह अपने दोनों बच्चों को मायके छोड़कर अपने पति संग केदारनाथ गई थीं। इस दौरान वहां पर बाढ़ आ गई थी। इसके बाद फैली महामारी में उनके 27 वर्षीय पति रमेश कपूर की मौत हो गई थी। उन्होंने बताया कि उसके पति हरियाणा के जिला सिरसा स्थित गांव बप्पा के रहने वाले थे।

उनकी गांव में आटे की चक्की व अन्य कारोबार था। लेकिन उनकी मौत के बाद सब खत्म हो गया। ससुराल  वालों ने भी उनका साथ छोड़ दिया। पति के बिजनेस में भी उचित हिस्सा नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने खुद ही उन्होंने अपने पैरों पर स्टैंड होने की ठानी। प्राइवेट अस्पताल में नौकरी सेवाएं शुरू की। उन्होंने बताया कि अब उनकी एक इच्छा है कि अपने बच्चों को बढ़िया तरीके से पढ़ा लिखाकर एक मुकाम तक पहुंचा दूं। उन्होंने बताया कि कई पल ऐसे भी आते हैं, जब बच्चे अपने पापा को मिस करते हैं। बच्चे पढ़ऩे लिखने में भी काफी होशियार है।
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पति की मौत के बाद बच्चे को बनाया कर्नल

फादर्स डे
13 अक्तूबर, 1987 का दिन आज भी याद है जब कर्नल इंदर बल सिंह बावा के शहीद होने की सूचना मिली थी। उस समय बेटा तेजिंदर सिंह बावा मात्र 14 साल और बेटी मनमीत बावा साढ़े बारह साल की थी। पति के शहीद होने का गम तो मन में था, लेकिन बच्चों को मां और पिता दोनों का प्यार देना था। उस दिन दृढ़ संकल्प लिया कि पति के संस्कारों को बच्चों में भरूंगी। हार नहीं मानूंगी।

ये संस्कार ही मेरे बच्चों के लिए पत्थर की लकीर बने और आज मेरे बच्चे अच्छे मुकाम पर हैं। ये कहना है पार्षद लिली बावा का। उन्होंने बताया कि बच्चों के लिए जरूरत पड़ने पर अपने बच्चों के लिए सख्त भी हुई और दुलार भी किया। तभी तो आज अपने बच्चों में अपने पति के संस्कार को देखती हूं। लिली बावा ने बताया कि 1989 में गैस एजेंसी खोली। उस समय हालात ऐसे थे कि बच्चे भी सिलेंडर सप्लाई करने जाते थे। लिली बावा ने अपने बच्चों में पिता के संस्कार भरे साथ ही बेटे को भी फौज में डाला।

उनका बेटा तेजिंदर सिंह भी फौज में कर्नल हैं। कर्नल बावा बताते हैं कि रात को खाने के बाद अक्सर मेरी मां हम दोनों भाई बहन को टहलाने ले जाती थीं। करीब 45 मिनट तक हम तीनों एक साथ होते थे। उस वक्त मां जीवन के उतार-चढ़ाव के बारे में अवगत कराती। उनकी सीख की बदौलत ही उनके बेटे अच्छी जगह पर हैं। उन्होंने बताया कि उनकी छोटी बहन यूएस में माइक्रोसॉफ्ट में इंजीनियर हैं। लिली बावा पंचकूला से लोकप्रिय पार्षद हैं।
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