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मांझी ने नीतीश को क्या दी सबसे कीमती चीज?

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बिहार में नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी से मुख्यमंत्री का पद भले ही छीना हो लेकिन इसके बदले मांझी को उन्होंने इससे अधिक क़ीमती चीज़ दी है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू की हार के एक दिन बाद नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा देकर मांझी को कुर्सी की पेशकश की थी जो ख़ुद जेडीयू के टिकट पर गया संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव हार गए थे।
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तब नीतीश ने मांझी को दरअसल 'आवाज़' दी थी जो शायद कहीं अधिक क़ीमती थी। इसके बाद मांझी अचानक बड़े हो गए और उनकी आवाज़ भी पहले से अधिक मायने रखने लगी, आज उन्हें महादलितों का प्रतिनिधि माना जाता है और राजनीति के बाज़ार में उनकी मांग रामविलास पासवान से अधिक है।

मुसहर जाति से कोई नेता इतना आगे नहीं बढ़ा जितना 17 महीने में मांझी आगे बढ़ गए। मांझी की जाति मुसहर बिहार की सभी 22 अनुसूचित जातियों में सबसे कमज़ोर जातियों में शुमार है।
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मांझी पहली बार विधायक भले ही 1980 में बने थे लेकिन मुख्यमंत्री बनने से पहले तक कोई उन्हें इतना नहीं जानता था। हालांकि पहली बार राष्ट्रीय मीडिया में उनका नाम प्रमुख रूप से तब आया जब नवंबर 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने।

नीतीश को छोड़ भाजपा के साथ हो लिए मांझी

शपथ ग्रहण समारोह के कुछ ही घंटों के बाद नीतीश ने मांझी से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा क्योंकि चारा घोटाला में उनका भी नाम आया था। लेकिन कुछ ही महीनों में घोटाले से नाम हटने पर मांझी को नीतीश ने अपनी कैबिनेट में दोबारा शामिल कर लिया। मांझी ने कांग्रेस और लालू-राबड़ी सरकार में भी काम किया।

इधर मांझी नीतीश कुमार पर लगातार ये आरोप लगाते रहे कि वे उन पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बना रहे थे, लेकिन वे ये भूल गए कि बतौर मुख्यमंत्री उनके पहले सात महीने के कार्यकाल के दौरान उन पर आरोपों की झड़ी लगाने वाला कोई नहीं बल्कि सुशील कुमार मोदी और भारतीय जनता पार्टी ही थी।

तब उन्हें न केवल नीतीश कुमार के हाथों की कठपुतली कहा गया, बल्कि जब ये पता चला कि मुख्यमंत्री ने अपने दामाद को निजी सचिव बना लिया है, तब मांझी और उनके दामाद को गिरफ्तार करने की मांग भी की गई।

मांझी ने जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भारत का मूल निवासी और ऊंची जातियों को बाहर वाला बताया, तब भी भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें पूरी ताक़त से निशाना बनाया।

सत्ता में रहते मांझी की आलोचना कर चुकी है भाजपा

मांझी ने जब लापरवाह डॉक्टरों के हाथ काटने वाला बयान दिया था, तब विपक्ष में बैठे इन्हीं नेताओं ने उनकी भर्त्सना की थी। जब उस मंदिर को गंगा जल से पवित्र किया गया था जहां मांझी गए थे, तो इस मुद्दे पर जेडीयू के नहीं बल्कि बीजेपी के नेताओं ने सवाल खड़े किए थे।

मुख्यमंत्री के तौर पर मांझी की आवाज़ जहां नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ धीरे-धीरे ऊंची होती गई, वहीं नीतीश कुमार ने मांझी पर नाम लेकर शायद ही कभी हमला बोला। नीतीश आज भी मांझी का नाम नहीं लेते और सीधे नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हैं।

मांझी का ये आरोप शायद सही भी हो कि नीतीश कुमार उन्हें स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देते थे, लेकिन मांझी पहले नेता तो नहीं जिनके साथ ऐसा हुआ हो। तमिलनाडु में पन्नीरसेल्वम ने कोई शिकायत किए बिना दो बार जयललिता की जगह भरी।

जयललिता जब आरोपमुक्त हुईं तो पन्नीरसेल्वम ने उनका ताज उन्हीं के हवाले कर दिया। यहां तक कि पन्नीरसेल्वम ने जयललिता के प्रति आभार जताया कि उन्होंने दो बार उन्हें तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनाया।
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सियासत का मूड भांप मांझी ने मारी पलटी

मांझी के मामले में ये उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही रही जिसकी वजह से उन्हें उन लोगों की गोद में जाकर बैठना पड़ा जिन्होंने उनका अपमान किया था। बीजेपी को मांझी की क्षमता का अहसास तब हुआ जब उनकी नौ महीने की सत्ता अपने अवसान पर थी।

मुख्यमंत्री बनने के बाद मांझी को अहसास हुआ कि नीतीश के कैम्प में रहे तो नवंबर 2015 के बाद उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। उन्हें लगा कि विधानसभा चुनाव में जेडीयू का सूपड़ा साफ़ हो जाएगा। उन्हें लगा कि वो यदि जीत गए तो भी सत्ता में नीतीश कुमार की ही वापसी होगी।

मांझी ने अनुमान लगाया कि नवंबर 2015 के बाद भारतीय जनता पार्टी उन्हें ऑफर देने के लिए बेहतर स्थिति में होगी। तभी से मांझी ने बीजेपी के साथ संबंध बढ़ाना शुरू किया और बगावत का झंडा बुलंद किया।

मांझी को पता था कि महादलित नेता के तौर पर बीजेपी के भीतर उनकी बड़ी क़ीमत होगी जिसका पुरस्कार भी बाद में उन्हें ज़रूर मिलेगा। कुल मिलाकर मांझी ने दूरदर्शिता से काम लिया।
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