मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पाटी ने जब डॉ. मोहन यादव को कमान सौंपी तो बिहार के राजनीतिक महकमे में हंगामा मच गया था। तब से अब तक, जब-जब मोहन यादव के नाम पर बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाईटेड या राज्य की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं से बात की गई तो जवाब उलटा मिला। राजद ने तो लालू प्रसाद यादव के सामने मोहन यादव को नगण्य ही कहा। लेकिन, जब मौका डॉ. मोहन यादव को मिला तो उन्होंने लालू के नाम की चर्चा तक नहीं की। अच्छी-बुरी कैसी भी नहीं। बिहार आकर बड़ी सभा को संबोधित करने के बावजूद भाजपा विरोध का झंडा बुलंद करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक का नाम नहीं लिया। बड़ा सवाल यही है कि ऐसा क्यों? आगे जानें जवाब।
बिहार में यादव वोटरों को लालू प्रसाद यादव के पीछे माना जाता है, हालांकि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में ट्रेंड थोड़ा बदलता दिखा था। मोहन यादव ने इस मामले में संभवत: यह फॉर्मूला रखा कि "सामने वाले का नाम न लो तो उसका महत्व वैसे ही घट जाता है"। उन्होंने बिहार, यादवों, बिहार के यादवों तक की चर्चा की, लेकिन लालू का नाम नहीं लिया। सभा के दौरान जब-जब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का नाम लिया, तब-तब खूब नारेबाजी हुई। इसके साथ ही पीएम मोदी के नाम पर भी नारेबाजी हुई। अगर लालू का नाम लेने पर कुछ उलट हो जाता तो उससे अच्छा था कि नाम लिया ही नहीं जाए। जहां तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सवाल है तो इस समय बिहार की राजनीति में संभावनाओं को देखते हुए भाजपा ने सीएम के प्रति नरमी का रुख कर लिया है। भाजपा नेता नीतीश पर सीधा हमला नहीं कर रहे हैं। नीतीश कुमार के पुराने साथी राज्यसभा सांसद व पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी एक्टिव हैं। मतलब, अगर नीतीश कुमार राजद के साथ असहज हुए तो भाजपा कोई रास्ता निकाल सकती है। राम मंदिर, सीट शेयरिंग आदि को लेकर राजद-जदयू के स्टैंड में दिख रही दूरी भी शायद वजह हो कि मोहन यादव ने नीतीश का नाम ही नहीं लिया।