पिछला घाटा कुल बजट का 6.8 फीसदी अनुमानित था, जो इस बजट में और बढ़ सकता है।
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स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे
दूसरे, देश में स्वास्थ्य क्षेत्र को और बेहतर तथा सक्षम बनाने के लिए ज्यादा पैसा चाहिए। पिछले बजट में वित्तमंत्री को कोविड के मद्देनजर लोक स्वास्थ्य के बजट में 137 फीसदी वृद्धि की थी। यह क्रम अभी भी जारी रखना होगा, क्योंकि हमने कोविड से लड़ने में काफी सफलता पाई है, लेकिन यह अंतिम स्थिति नहीं है। कोरोना की चुनौती लंबे समय तक जारी रह सकती है।
आज देश में बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। सरकारी भर्तियां तुलनात्मक रूप से बहुत कम और बहुत देरी से हो रही हैं। जो हो रही हैं, उनमें भी गड़बडि़यां हैं, जैसा कि हमने हाल में रेलवे भर्ती बोर्ड की भर्ती परीक्षाओं में देखा। भारत में बेरोजगारी की दर 8 फीसदी है, जो 2020 में 7 फीसदी थी। इसका मतलब यही है कि रोजगार के नए अवसर निर्मित नहीं हो रहे हैं और कई लोगों के पास जो पास रोजगार था, वो भी छूट गया है। यह गंभीर स्थिति है।
वित्तमंत्री निजी और सरकारी क्षेत्र में रोजगार निर्माण के लिए अनुकूल घोषणाएं कर सकती हैं। इसके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश और उत्पादकता बढ़ाने वाले सुधारों को नए बजट में जारी रखा जा सकता है। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी ज्यादा निवेश तथा प्राथमिक एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बजट में समुचित प्रावधान अपेक्षित है।
आय को बढ़ाने की चुनौतियां
केन्द्रीय वित्त मंत्री के समक्ष जहां देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने की चुनौती है, वहीं सरकारी खजाना भरने के लिए आय के साधन जुटाने का चुनौती भी है।
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकारी खर्च बढ़ाने के लिए सरकार को बजट घाटे की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। पिछला घाटा कुल बजट का 6.8 फीसदी अनुमानित था, जो इस बजट में और बढ़ सकता है।
- सरकार की आय का एक बड़ा साधन विनिवेश भी है। इस दृष्टि से बरसों की मेहनत के बाद भारी घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की विमान कंपनी एयर इंडिया को टाटा समूह को बेचने में सरकार को सफलता मिली है।
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- इसी तरह बैंकों का एनपीए कम करने के लिए सरकार ने बैड बैंक की स्थापना को मंजूरी दी है। यह बैंक सरकारी बैंकों के एनपीए की वसूली का काम करेंगे जबकि सामान्य बैंकों को अपनी बैलेंस शीट सुधारने में मदद मिलेगी।
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- इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी एलआईसी का संभावित आईपीओ भी सरकारी आय बढ़ाने की दिशा में एक ठोस कदम है। लेकिन अभी भी सरकार को अपनी आर्थिक सेहत सुधारने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत है।
इधर, इसका एक कारण यह भी है कि कर वसूली के मोर्चे पर हालात अभी भी संतोषजनक नहीं है। हालांकि जीएसटी वसूली बीते वित्तीय वर्ष में अच्छी रही है, लेकिन बाकी करों के मामले में ऐसा नहीं कहा सकता। देश के जीडीपी में कर की हिस्सेदारी 9-10 फीसदी के स्तर पर ठहरी हुई है। 2018-19 में यह 11 फीसदी के स्तर पर थी। इसे बढ़ाने की आवश्यकता है।
अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कर संरचना में बदलाव की उम्मीद है। कारोबारी जगत टैक्स इनपुट क्रेडिट व्यवस्था फिर लागू करने की मांग कर रहा है। साथ ही प्रदूषण रोकने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स करने की जायज मांग भी है ताकि लोगो की पेट्रोल डीजल चलित वाहनो पर निर्भरता कम हो। नए उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप योजना को और आकर्षक बनाना जरूरी है।
इसके अलावा देश की सीमाओं की रक्षा और तीनो सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए रक्षा बजट में भी वृद्धि की घोषणा नए बजट में हो सकती है। वित्त मंत्री यह सिद्ध करने की कोशिश करेंगी कि देश की अर्थव्यवस्था 9.2 फीसदी की गति से विकसित होने को तैयार है।
अब यह वित्त मंत्री की दूरदर्शिता, आर्थिक समझ और कल्पनशीलता पर निर्भर करता है कि वो देश को अर्थ व्यवस्था को कितनी गति देती हैं और न केवल इस साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ( एनडीए) की जीत की नींव कितनी पुख्ता तरीके से रख पाती हैं।
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