निवर्तमान प्रधानमंत्री योशिहिडे सुगा आबे के समय मुख्य कैबिनेट सचिव थे। अपने एक साल के कार्यकाल में उन्होंने अमेरिका के मामले में मोटे तौर पर आबे की नीतियों को जारी रखा। मुचिजुकी ने कहा- ‘अमेरिका निश्चित रूप से चाहेगा कि किशिदा का कार्यकाल आबे की नीतियों का तीसरा अध्याय साबित हो। लेकिन उसकी ये इच्छा अनुचित और यथार्थ से दूर होगी।’ उन्होंने कहा- ‘किशिदा जापान की सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी में तनाका-ओहिरा लाइन के समर्थक माने जाते हैं। ये लाइन चीन के साथ संबंध को महत्त्व देने की है। इस लाइन में जोर टकराव को बढ़ावा ना देने पर रहा है।’ काकुई तनाका 1970 के दशक में जापान के प्रधानमंत्री थे। माययोशी ओहिरा उनके विदेश मंत्री थे। चीन के साथ जापान के संबंधों को सामान्य बनाने का श्रेय उन दोनों नेताओं को ही दिया जाता है।
मीडिया विश्लेषकों ने कहा है कि किशिदा के कार्यकाल में विदेश नीति को अमेरिका बनाम चीन के नजरिए से देखने का ट्रेंड कमजोर पड़ सकता है। इसके बदले दूसरे देशों के साथ संबंधों को बढ़ाने की नीति पर जापान चल सकता है। उन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस, और जर्मनी शामिल हैँ।
अमेरिकी थिंक टैंक रैंड कॉर्प में राजनीतिक शास्त्री जेफरी हॉर्नंग के मुताबिक अफगानिस्तान में जो तर्जुर्बा रहा, उसका असर अब अमेरिका जापान संबंधों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने जो गलत आकलन किया, उसका असर दुनिया भर में अमेरिका के सहयोगी देशों पर पड़ा है। ये देश अब पूछ रहे हैं कि अगर चीन से उनका संघर्ष हुआ, तो उनकी मदद के लिए अमेरिका किस हद तक आगे आएगा?