अफगानिस्तान में अमेरिका और तालिबान के बीच चल रही शांति वार्ता काबुल हमले के बाद रद्द कर दी कई है। इस हमले में एक अमेरिकी सैनिक समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। जिसके बाद अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने कैंप डेविड में तालिबानी नेताओं के साथ होने वाली बैठक को स्थगित करने का एलान कर दिया। वहीं ट्रंप के फैसले रूस ने भी निराशाजनक बताया है। इसी बीच तालिबान ने रूस की सीमा से सटे तखार प्रांत पर कब्जा कर लिया है, इससे पहले तालिबान ने अनारदारा पर कब्जा किया था।
तखार उत्तरी अफगान प्रांत का हिस्सा है और तालिबान पिछले कई महीनों से इस पर कब्जा करने की कोशिशों में जुटा हुआ था। तखार तालिबान के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ताखर की सीमाएं तजाकिस्तान के साथ मिलती है। यहां से मध्य एशिया और अन्य जगहों के आतंकवादियों का सुरक्षित प्रवेश हो सकता है। इसके अलावा तखार की सीमा अफगानिस्तान में बडाकान को भी छूती हैं, जो तजाकिस्तान, चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से लगा हुआ है। इसके अलावा कुंडुज, बागलान, समंगन, पंजशीर और बल्ख के प्रांतों से सटा हुआ है।
वहीं अमेरिका का कहना है कि रूस तालिबान को हथियार मुहैया कर रहा है, हालांकि रूस ने इन आरोपों से इनकार किया है। अफगानिस्तान में रूसी राष्ट्रपति के विशेष प्रतिनिधि और विदेश मंत्रालय में निदेशक जामिर काबुलव का कहना है कि सभी मुद्दों को अलग रख कर दोनों पक्षों को शांति वार्ता जारी रखनी चाहिए। खास बात यह है कि चीन भी रूस का समर्थन कर रहा है। दोनों देशों के अफगानिस्तान में निजी हित भी हैं और दोनों के तालिबान से संपर्क भी हैं। बावजूद इसके दोनों देश मानते हैं कि अफगान मुद्दे के स्थाई समाधान के लिए अमेरिका की भागीदारी अहम है।
वहीं अमेरिका के साथ तालिबान की बातचीत टूटना भारत के लिए राहत भरी खबर है। बारत शुरू से ही इस शांति वार्ता का विरोध करता रहा है। ये इसलिए भी अहम है क्योंकि अगर अमेरिका अफगानिस्तान से अपने पांच हजार सैनिकों की वापसी करता है, तो तालिबान वहां बड़ी ताकत के तौर पर उभरेगा, जिसका कंट्रोल पाकिस्तान के पास होगा। ईरान में लगे चाबहार प्रोजेक्ट और अफगानिस्तान में निवेश और वहां चल रहे विकास कार्यों में भी बाधा पहुंचेगी।
साथ ही पाकिस्तान अफगानी आतंकियों का इस्तेमाल भारत में आतंकी हमलों के लिए कर सकता है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में 14 हजार अमेरिकी सैनिक मिला कर 20 नाटो सैनिक हैं।
यह बात इसलिए भी अहम है कि 9/11 की बरसी पर तालिबान ने काबुल में आतंकी हमला करके यह जता दिया है कि वह भी कमजोर नहीं हुआ है और टक्कर देने का माद्दा रखता है। वहीं अफगान सेना अभी इतनी मजूबत नहीं है कि अकेले तालिबान का सामना कर सके। अमेरिका से नौ दौर की शांति वार्ता जारी रहने के दौरान भी तालिबान लगातार हमले करता रहा। यहां तक कि जिस दिन ट्रंप ने शांति वार्ता रद्द करने का एलान किया, तब भी तालिबान ने कुंदूज पर हमले की कोशिश की थी। कहा जाता है कि पिछले 18 सालों में तालिबान इस समय सबसे मजबूत स्थिति में है और अमेरिका सेना की कार्रवाई के बाद अफगानिस्तान के आधे से ज्यादा हिस्सा पर उसका कब्जा है।
शांति वार्ता रद्द होने के बाद तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने सीधे तौर पर अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि वह अमेरिका फौजों को निशाना बनाता रहेगा। तालिबान का कहना है कि अफगानिस्तान में कब्जे को खत्म करने के दो ही रास्ते हैं, या तो संघर्ष करें या फिर मध्यस्थता के लिए तैयार हों। साथ ही ट्रंप को यह भी चेतावनी दी है कि वे जल्द ही शांति वार्ता रद्द करने पर अफसोस करेंगे। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना 2001 से तैनात है और ट्रंप कह चुके हैं कि वहां से सेना हटाना उनकी प्राथमिकता की सूची में है।
पिछले 18 सालों में अफगानिस्तान में शांति बहाली के नाम पर 2500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है 20 हजार से ज्यादा सैनिक घायल हो कर अपाहिज हो चुके हैं। अमेरिका वहां से जल्द से जल्द निकलना चाहता है क्योंकि यह उस पर आर्थिक तौर पर भी भारी पड़ रहा है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो शुरू से ही इस समझौते के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था तालिबान अपनी मनमानी चलाने के साथ अपनी शर्तों पर बातचीत कर रहा है।
अमेरिका और तालिबान में पिछले कई महीनों से कतर की राजधानी दोहा में बातचीत चल रही है। अमेरिका ने अफगानिस्तान में सुलह प्रयासों के लिए पूर्व अमेरिकी राजदूत जल्मे खलीलजाद को तालिबान से बातचीत करने के लिए नियुक्त का था। वहीं इस वार्ता में तालिबान के साथ अफगान सरकार भी बातचीत का हिस्सा थी और कैंप डेविड में होनी वाली बातचीत में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के आने भी सहमति बनी थी, लेकिन शांति वार्ता रद्द होने के बाद खलीलजाद को वापस वाशिंगटन बुला लिया गया।