युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में स्थायी आजादी की स्थापना के उद्देश्य से पहुंची दुनिया की महाशक्ति को अंतत: मुंह की खानी पड़ी। हजारों सैनिकों की जान गंवाने और करोड़ों डॉलर पानी की तरह बहाकर भी अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ। उल्टे उसे खूंखार तालिबान आतंकियों से समझौते की तोहमत झेलनी पड़ी है। पेश है अमेरिका के 20 साल के अफगानिस्तान सफर का विश्लेषण...
मौत : 1.75 लाख लोगों की
खर्च : 146 लाख करोड़ रुपये
फिर भी खाली हाथ लौटा
अमेरिका के आखिरी सैनिकों को लेकर अफगानिस्तान से पांच सी-17 विमानों द्वारा सोमवार रात भरी गई आखिरी उड़ान इस देश में 20 साल चले युद्ध की समाप्ति की घोषणा बनी। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में 3,000 हजार लोगों की जान लेने वाले आतंकी हमले के ठीक बाद छेड़ा गया यह युद्ध करीब 1.75 लाख लोगों की जान लेने और 146 लाख करोड़ रुपये खर्च करने बाद खत्म हुआ। सबसे अहम, अमेरिका उन इस्लामी आतंकियों तालिबान को हराने में विफल रहा, जिनके खिलाफ इसे शुरू किया था क्योंकि उन्हाेंने 11 सितंबर के हमलावर आतंकी संगठन अल कायदा को शरण दी थी।
चार राष्ट्रपतियों के शासनकाल में चले इस युद्ध के बाद हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से भागते समय अमेरिकी उन दसियों हजार अफगान नागरिकों को उनके हाल पर छोड़ गए, जिन्हाेंने दो दशकों में आतंकियों के खिलाफ कई प्रकार से अमेरिका को मदद दी। इनमें से कई लोगों के पास अमेरिका का वैध वीजा भी है, लेकिन जिस तेजी से अमेरिका ने अपनी सेना लेकर भगाने का निर्णय लिया, उसने इन लोगों को करीब दो हफ्ते तक एयरपोर्ट के बाहर राह ताकता निराश छोड़ दिया। सोमवार को हवाईअड्डे के बाहर कुछ सौ लोग ही रुके नजर आए। अफगानिस्तान भी उन्हीं आतंकियों के हवाले कर दिया, जिन्हें 2001 में अमेरिका ने सत्ता से बेदखल कर लोकतंत्र की शुरुआत की थी।
अमेरिकी सेना ने एयरपोर्ट के उपकरण नहीं किए बेकार
अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड के प्रमुख मैरीन जनरल फ्रेंक मैकेंजी ने पहले बताया था कि उनके जवानों ने काबुल एयरपोर्ट पर मौजूद 27 हमवी और 73 विमानों को बेकार कर दिया है। हालांकि उन्होंने कहा था कि जवानों ने ऐसा कोई उपकरण बेकार नहीं किया है।
अब कूटनीति होगी : अमेरिका
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने मंगलवार के बाद भी लोगों को निकालने की बात कही थी। लेकिन तालिबान की धमकी के बाद अमेरिका ने 24 घंटे पहले ही देश छोड़ दिया। अमेरिका के विदेश मंत्री ने कहा, ‘सैन्य मिशन पूरा हुआ। अब अफगानिस्तान के साथ संबंधों का नया दौर शुरू हो चुका है। इसमें कूटनीति होगी।’
भविष्य : किसका, क्या होगा?
सरकार का : तालिबान ने कट्टर इस्लामी तौर तरीके शासन में लागू करने के संकेत दिए हैं। प्रमुख नेता हैबतुल्लाह अखुंदजादा अब तक सामने नहीं आया है। हक्कानी नेटवर्क के अमेरिका द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी भी नई शासन व्यवस्था का हिस्सा हो सकते हैं।
अमेरिकी मददगारों का : अमेरिका के लिए काम करने वाले हजारों अफगान नागरिकों तक तालिबान का पहुंचना मुश्किल नहीं होगा। बायोमीट्रिक रिकॉर्ड भी उसके हाथ पड़ गए हैं। अमेरिका द्वारा इन नागरिकों को छोड़ दिए जाने से उनका और उनके परिवार का जीवन खतरे में है।
बाकी नागरिकों का : 4 करोड़ नागरिकों के लिए आने वाले दिन बेहद संकट भरे हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि खाद्य पदार्थों का भयंकर संकट हो सकता है। काबुल में ही हालात बिगड़े हुए हैं, तो बाकी हिस्साें का अंदाजा लगाया जा सकता है। वित्तीय सेवाएं व चिकित्सा सुविधाएं तक ठप हैं।
आंकड़ों में अफगानिस्तान युद्ध की कहानी
- 2001 में अमेरिका ने स्थायी आजादी का एलान कर अफगान जंग छेड़ी
- अमेरिका की यह सबसे लंबी सैन्य तैनाती
- 04 राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में जंग चलती रही
- 08 लाख अमेरिकी सैनिकों ने सेवा दी जंग में
- 51 देशों की सेना ने अफगान जंग में हिस्सा बनी
- 2,365 अमेरिकी सैनिकों ने जान गंवाई
- 1,144 फौजी नाटो और अन्य देशों के मारे गए
- 20 हजार से ज्यादा सैनिक लड़ाई में घायल हुए
- 66 हजार अफगान सैनिकों व पुलिसकर्मीयों की मौत, 47,345 अफगान नागरिक मरे
- 51,191 से ज्यादा तालिबान मारे गए