फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव: निचले वायुमंडल में फैलाव, उड़ानों पर होगा असर

Thu, 18 Nov 2021 06:37 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला रिसर्च डेस्क, लंदन।

सार

वर्ष 2001 से 2020 के बीच पृथ्वी के वायुमंडल में 174 फुट का फैलाव दर्ज किया गया है। इस कारण विमानों को भविष्य में सुरक्षित और बिना टर्बलेंस के यात्रा करनी है तो अधिक ऊंचाई पर उड़ान भरनी होगी।
विज्ञापन
विमानों की उड़ान पर जलवायु परिवर्तन का असर - फोटो : iStock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का असर विमानों की उड़ान पर भी पड़ेगा। अमेरिका के राष्ट्रीय वायुमंडल अनुसंधान केंद्र ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी के सबसे निचले वायुमंडल जिसे ट्रोपोस्फेयर (क्षोभमंडल) कहते हैं, उसमें फैलाव देखा गया है।

विज्ञापन


वर्ष 2001 से 2020 के बीच पृथ्वी के वायुमंडल में 174 फुट का फैलाव दर्ज किया गया है। इस कारण विमानों को भविष्य में सुरक्षित और बिना टर्बलेंस के यात्रा करनी है तो अधिक ऊंचाई पर उड़ान भरनी होगी। विमान जलवायु परिवर्तन से हुए फैलाव के बीच उड़ान भरेंगे तो अत्यधिक दबाव के कारण यात्रा असंभव होगी।

  • 08 किमी ऊपर (धरती से) तक हुआ तापमान वृद्धि का बदलाव, भूमध्यरेखा पर 17 किमी क्षेत्र में असर
  • 174 फुट तक एक दशक में फैल गया क्षोभमंडल, यह खुलासा अमेरिका की एक रिपोर्ट में हुआ


धरती के वायुमंडल की सबसे निचली सतह है क्षोभमंडल
वैज्ञानिकों के अनुसार क्षोभमंडल पृथ्वी के वातावरण की सबसे निचली सतह है। वायुमंडल का अधिकांश 75 से 80 फीसदी द्रव्यमान इसी क्षोभमंडल में होता है। अधिकतर बादल इसी क्षोभमंडल में पाए जाते हैं। इसके अलावा मौसम से जुड़ी अन्य गतिविधियां भी इसी सतह के मध्य होती हैं। इस मंडल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के बढ़ते दबाव का प्रभाव विमानों की उड़ान पर भी पड़ेगा।

विज्ञापन


8 से 17 किमी तक फैलाव दिखा
वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि क्षोभमंडल में फुलाव का सीधा संबंध तेजी से बढ़ते तापमान से है। ये भी अहम है कि ये समुद्र तल से ध्रुवों पर पृथ्वी की सतह से लगभग आठ किलोमीटर ऊपर और भूमध्य रेखा पर करीब 17 किमी इलाके में यह घटना देखी गई है। सह-शोधकर्ता बिल रांडेल का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ग्रीन हाउस गैसें वातावरण की क्रिया को भंग कर रही है जिसके कारण ऐसी स्थिति बनी है।

विमान की उड़ान को समझें
यात्री विमान औसतन तीस से 25 हजार फीट और अधिकतम 40 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं। इसका मतलब यह है कि यात्री विमान औसतन 8 किलोमीटर से लेकर 11 किमी की ऊंचाई पर उड़ान भरता है। विमान को इस ऊंचाई पर पहुंचने के लिए 15 से 30 मिनट का वक्त लगता है। बहुत कुछ मौसम पर निर्भर करता है। यदि मौसम में बदलाव आता है तो इसका सीधा असर उड़ानों पर पड़ना तय है।

मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार
वैज्ञानिकों के अनुसार क्षोभमंडल में कई बदलाव आ रहे हैं। पृथ्वी के सबसे निचले वायुमंडल में हो रहे बदलाव के लिए मानवीय गतिविधियां 80 फीसदी तक जिम्मेदार हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण पृथ्वी के सबसे निचले स्तर में इस तरह की गतिविधियां अधिक है। ऐसे में विमानों को सुरक्षित उड़ान भरनी है तो भविष्य में आकाश में उड़ान की ऊंचाई और बढ़ानी होगी।

समय के साथ बढ़ रहा फुलाव
वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 1980 से वर्ष 2000 के बीच क्षोभमंडल में फुलाव की दर प्रति दशक 164 फुट थी। अब ये बढ़कर 174 हो गई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि क्षोभमंडल का फुलाव इसी तरह से बढ़ता गया तो दुनिया को आने वाले समय में पृथ्वी के साथ आकाशीय हलचल भी देखनी होगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें