विश्लेषकों का कहना है कि ये तमाम घटनाएं उस समय हुईं, जब कोरोना महामारी के बाद दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में नई गति आई है। उसकी वजह से ऊर्जा की मांग बढ़ी है। इसके बीच कोयला के जरिए बिजली उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करने वाले देशों में चीन अकेला नहीं है। यूरोपीय नेता भी अब अधिक पुरजोर आवाज से कहने लगे हैं कि जीवाश्म ऊर्जा (फॉसिल फ्यूल) में कटौती करना संभव नहीं है। ब्रिटेन की सरकार ने बिजली की मांग पूरी करने के लिए अपने पुराने ताप बिजली संयंत्रों को फिर चालू करने का आदेश दिया है। जबकि ईयू के कुछ देशों में कोयला और कच्चे तेल से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने की समयसीमा बढ़ाने पर विचार किया जाने लगा है।
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान उन नेताओं में सबसे आगे हैं, जिन्होंने ग्रीन डील के खिलाफ बोलना शुरू किया है। उन्होंने कहा है कि इस डील को लागू करने के उत्साह में ईयू की नौकरशाही ने मौजूदा ऊर्जा संकट को खड़ा किया है। जबकि ईयू के ऊर्जा आयुक्त काड्री सिमसन ने कहा है कि यूरोप के ऊर्जा संकट का एकमात्र स्थायी समाधान ग्रीन डील ही है। इस खींचतान के बीच कॉप-26 को लेकर चिंता बढ़ गई है। ये आशंका पैदा हो गई है कि वहां ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो सकेगा।