बीते दो दशक में अफगानिस्तान में हुए मानवाधिकार विकास को तालिबान खत्म करने पर उतारू है। महिलाओं पर बंदिशें, अभिव्यक्ति पर पाबंदी, नागरिक संगठनों के दमन और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाकर तालिबान मानवाधिकारों को कुचल रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स व वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन अगेंस्ट टॉर्चर ने तालिबान द्वारा घर-घर जाकर मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों को शिकार बनाए जाने पर चिंता जाहिर की है।
राजनीतिक विश्लेषक हाकिम कमाल कहते हैं- तालिबान लगातार मानवाधिकारों का उल्लंघन करता रहा तो पश्चिमी देश उसे कभी मान्यता नहीं देंगे। लेकिन, तालिबान यह सब जानते हुए भी वही कर रहा है, जो उसने अतीत में किया था।
तालिबान के सूचना व संस्कृति मंत्रालय के उप-मंत्री ने सोमवार को कहा था कि दुनिया पहले तालिबान को मान्यता दे, उसके बाद इस्लामी अमीरात की सरकार इस्लामी कानूनों के दायरे में मानवाधिकारों के मसले पर विचार करेगी। तालिबान की तरफ से इस तरह के बयान यह जाहिर करने के लिए काफी हैं कि उन्हें मानवाधिकारों की वाकई कोई फिक्र नहीं है। एजेंसी
अत्याचार की आदत पुरानी
दक्षिण एशिया में एमनेस्टी इंटरनेशनल की उप-निदेशक दिनुषिका दिसानायके बताती हैं, जब से तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया है यह बात साफ है मानवाधिकार उनके लिए मायने नहीं रखते। बदले की हिंसा, महिलाओं पर अत्याचार और प्रदर्शन करने वालों का दमन हम पहले ही देख चुके हैं। अब मीडिया, नागरिक संगठन और मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों को निशाना बनाया जा रहा है।
महिलाओं को हक नहीं
महिला अधिकार कार्यकर्ता जर्का यफ्ताली कहती हैं, महिलाओं को पढ़ने और काम करने का हक नहीं है। वे राजनीति में शामिल नहीं हो सकतीं इसी से अंदाजा लगा सकते हैं देश किस तरह के मानवीय संकट से गुजर रहा है।
स्विट्जरलैंड से अफगान महिलाओं के लिए लड़ती रहेंगी पूर्व मेयर जरीफा
अफगानिस्तान की गिनी-चुनी महिला नेताओं में से एक व मयदान शाहरी की पूर्व मेयर जरीफा गफारी स्विट्जरलैंड में बस सकती हैं। उनके लिए विशेष अनुमित देने की तैयारी की जा रही है। वे जल्द ही सांसदों से मिलेंगी। 29 वर्षीय गफारी ने तालिबान के खिलाफ ‘इट्स नॉट माई गवर्नमेंट’ अभियान शुरू किया था। वे 2019 से इस वर्ष जून तक मयदान शाहरी की मेयर थीं। गफारी ने रक्षा मंत्रालय में भी काम किया था।
आधी आबादी के बिना नहीं चल सकती सरकार
गफारी कहती हैं, आधी आबादी को उचित प्रतिनिधित्व के बिना कोई सरकार नहीं चल सकती। महिलाएं तालिबान की समर्थक नहीं हैं। गफारी लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील कर रही हैं कि तालिबान से महिलाओं के हक पर बात की जाए। इसके अलावा उन्होंने अफगान महिलाओं के प्रतिनिधि के तौर पर जेनेवा में शांति वार्ता के दौरान तालिबानी नेताओं से बात करने का प्रस्ताव भी रखा।
पाकिस्तान पर दबाव बनाकर तालिबान से हो सकती है बात
गफारी का कहना है कि कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तालिबान को बातचीत के रास्ते पर लाने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए। यूएनसीएचआर में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर प्रस्ताव का पाकिस्तान ने समर्थन तो किया, लेकिन, अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग नहीं हुई।