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कश्मीर राग: ‘सेना के आकाओं’ को खुश करने के लिए हर बार अलापता है पाकिस्तान, फिर भी दुनिया नहीं मानती उसकी बात

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Sat, 25 Sep 2021 02:03 PM IST

सार

भारत और पाकिस्तान के पहले से तल्ख रिश्तों में हर बार कश्मीर को लेकर कड़वाहट बढ़ जाती है। जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने का फैसला भारत का अंदरूनी मामला है लेकिन इस बात से पाकिस्तान तो और बौखलाया बैठा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कश्मीर का मुद्दा उठाना पाकिस्तान की मजबूरी है क्योंकि यह उसके वजूद की लड़ाई है।
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान - फोटो : twitter.com/ImranKhanPTI
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए संबोधन में भी एक बार फिर वही पुराना कश्मीर राग अलापा है। इमरान ने कहा कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति जम्मू-कश्मीर विवाद के समाधान पर निर्भर है। पाकिस्तान को इस पर भारत से करारा जवाब मिला है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की प्रथम सचिव स्नेहा दुबे ने कहा, कई देशों को यह जानकारी है कि पाकिस्तान का आतंकियों को पनाह देने, उन्हें सक्रिय रूप से समर्थन देने का इतिहास रहा है। यह उनकी नीति है। यह एक ऐसा देश है, जिसे विश्व स्तर पर आतंकियों को समर्थन देने, हथियार उपलब्ध कराने और आर्थिक मदद करने के रूप में पहचान मिली है।

आखिर क्या वजह है कि पाकिस्तान अक्सर यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर की बात उठाता है और हर बार उसे भारत से न केवल करारा जवाब मिलता है बल्कि लताड़ भी मिलती है। लेकिन पाकिस्तान है कि बाज नहीं आता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि पाकिस्तान ऐसा केवल सेना के अपने आकाओं को खुश करने के लिए ही करता है क्योंकि वे कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखना चाहते हैं।


किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह है पाकिस्तान 
पूर्व विदेश सचिव शशांक बताते हैं पाकिस्तान को किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता की तरह समझिए। जैसे किसी पार्टी के प्रवक्ता अपनी पार्टी की नीतियों और विचारधारा के अनुरूप अपने आलाकमान को खुश करने के लिए बयान देते हैं उसी तरह पाकिस्तान का भी बॉस है उनकी सेना। सब जानते हैं कि पाकिस्तान में  सेना की ही चलती है और वहां की सरकार सेना के हाथों की कठपुतली होती है। इमरान खान भी उनके समर्थन से ही सत्ता में आए हैं इसलिए वे अपनी सेना के आकाओं को खुश करने के लिए इस तरह की बात करते हैं। इमरान खान आज जो कर रहे हैं उनसे पहले के प्रधानमंत्री भी ऐसा ही करते रहे हैं। यह पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है। 

पाकिस्तान में सेना के मुखौटे वाली सरकार 
पूर्व विदेश सचिव यह भी कहते हैं कि पाकिस्तान पर आधिकारिक तौर पर सेना का कंट्रोल नहीं है क्योंकि पाकिस्तान को डर है कि यदि उसकी सेना सत्ता में सीधे तौर पर आ गई तो कॉमनवेल्थ देशों की सूची से उसे बाहर निकाल दिया जाएगा। कॉमनवेल्थ देशों का यह नियम है कि यदि किसी देश पर सेना का कब्जा होता है तो उसे बाहर निकाल दिया जाता है। लेकिन यह बात सच है कि वहां सेना के मुखौटे वाली सरकार है। पाकिस्तान सेना में कई कट्टर लोग शामिल हुए हैं।

 
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान - फोटो : twitter.com/ImranKhanPTI
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए संबोधन में भी एक बार फिर वही पुराना कश्मीर राग अलापा है। इमरान ने कहा कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति जम्मू-कश्मीर विवाद के समाधान पर निर्भर है। पाकिस्तान को इस पर भारत से करारा जवाब मिला है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की प्रथम सचिव स्नेहा दुबे ने कहा, कई देशों को यह जानकारी है कि पाकिस्तान का आतंकियों को पनाह देने, उन्हें सक्रिय रूप से समर्थन देने का इतिहास रहा है। यह उनकी नीति है। यह एक ऐसा देश है, जिसे विश्व स्तर पर आतंकियों को समर्थन देने, हथियार उपलब्ध कराने और आर्थिक मदद करने के रूप में पहचान मिली है।

आखिर क्या वजह है कि पाकिस्तान अक्सर यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर की बात उठाता है और हर बार उसे भारत से न केवल करारा जवाब मिलता है बल्कि लताड़ भी मिलती है। लेकिन पाकिस्तान है कि बाज नहीं आता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह तो यह है कि पाकिस्तान ऐसा केवल सेना के अपने आकाओं को खुश करने के लिए ही करता है क्योंकि वे कश्मीर मुद्दे को जिंदा रखना चाहते हैं।

किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह है पाकिस्तान 
पूर्व विदेश सचिव शशांक बताते हैं पाकिस्तान को किसी राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता की तरह समझिए। जैसे किसी पार्टी के प्रवक्ता अपनी पार्टी की नीतियों और विचारधारा के अनुरूप अपने आलाकमान को खुश करने के लिए बयान देते हैं उसी तरह पाकिस्तान का भी बॉस है उनकी सेना। सब जानते हैं कि पाकिस्तान में  सेना की ही चलती है और वहां की सरकार सेना के हाथों की कठपुतली होती है। इमरान खान भी उनके समर्थन से ही सत्ता में आए हैं इसलिए वे अपनी सेना के आकाओं को खुश करने के लिए इस तरह की बात करते हैं। इमरान खान आज जो कर रहे हैं उनसे पहले के प्रधानमंत्री भी ऐसा ही करते रहे हैं। यह पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं है। 

पाकिस्तान में सेना के मुखौटे वाली सरकार 
पूर्व विदेश सचिव यह भी कहते हैं कि पाकिस्तान पर आधिकारिक तौर पर सेना का कंट्रोल नहीं है क्योंकि पाकिस्तान को डर है कि यदि उसकी सेना सत्ता में सीधे तौर पर आ गई तो कॉमनवेल्थ देशों की सूची से उसे बाहर निकाल दिया जाएगा। कॉमनवेल्थ देशों का यह नियम है कि यदि किसी देश पर सेना का कब्जा होता है तो उसे बाहर निकाल दिया जाता है। लेकिन यह बात सच है कि वहां सेना के मुखौटे वाली सरकार है। पाकिस्तान सेना में कई कट्टर लोग शामिल हुए हैं।

 

पाकिस्तानी सेना - फोटो : सोशल मीडिया
कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण की कोशिश 
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ए जे बी जैनी (सेवानिवृत्त) का मानना है 1947 से लेकर अब तक पाकिस्तान का यह फोकस रहा है कि कश्मीर  मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण किया जाए। ताकि इस्लामिक देशों का दबाव डाला जा सके। एक समय ऐसा आ भी गया था कि कुछ देशों ने इस पर बोलना भी शुरू कर दिया। लेकिन भारत ने जब इस पर सख्ती दिखाई तो वे पीछे हटे। 

उनके मुताबिक यूनाइटेंड नेंशन मिलिट्री ऑब्जर्वर्स ग्रूप इन इंडिया एंड पाकिस्तान ने भारत में अपना दफ्तर खोल लिया और कश्मीर में मानवाधिकार के उलल्घन की बात करके उसकी रिपोर्टिंग शुरू की। पाकिस्तान इस पर बहुत खुश हुआ था। लेकिन जब भारत ने दो टूक जवाब दिया और कहा कि कश्मीर हमारा अंदरूनी मामला है और दफ्तर को बंद करवाया तब पाकिस्तान की रणनीति फेल हो गई और वे इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंचा सके। 

आखिर ऐसा क्यों करता है पाकिस्तान
जैनी का कहना है पाकिस्तान टू नेशन थ्योरी पर बना था। आजादी तो हिन्दुस्तान मिली थी, उसकी तो पैदाईश हुई थी। 1971 का जब बांग्लादेश बना तो टू नेशन थ्योरी गुब्बारे की तरह फूट गया। इसलिए वह बार-बार कश्मीर की बात करता है क्योंकि यह उसके सर्वाइवल का सवाल है। क्योंकि पावर सेंटर सेना है और वही तो सब कुछ वहां तय करती है। वे जिएं कैसे?  टू नेशन थ्योरी फेल हो गई तो' 'हेट इंडिया' का जुमला उछालते हैं और वे आगे भी कश्मीर का हल्ला मचाते रहेंगे। लेकिन एक चीन और तुर्की को छोड़कर कोई भी देश पाकिस्तान की बात नहीं मानता है क्योंकि दूसरे देश यह मानते हैं कि यह दो देशों के बीच का आंतरिक मामला है।

2014 में भी अंग्रेजी विद्वान ने भी कही थी यह बात
2014 में एक प्रख्यात अमेरिकी विद्वान ने भी यह कहा था कि पाकिस्तान की सेना नहीं चाहती कि कश्मीर मुद्दे का समाधान हो क्योंकि यह उनके अस्तित्व और देश के राजनीतिक ढांचे में उनके प्रभुत्व के लिए एक गंभीर चुनौती होगी। 'फाइटिंग टू द एंड: द पाकिस्तान आर्मीज वे ऑफ वॉर' के लेखक सी क्रिस्टीन फेयर ने एक प्रख्यात अमेरिकी थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट की ओर से आयोजित उनकी किताब के औपचारिक लॉन्चिंग के मौके पर कहा था  "वे (पाकिस्तानी सेना) कश्मीर पर कोई समझौता नहीं करना चाहते हैं। सेना किसी भी ऐसी प्रक्रिया को आगे बढ़ने की अनुमति क्यों देगी जो उसकी अपनी राजनीति को खत्म कर देगी?  

नवाज शरीफ के साथ प्रधानमंत्री मोदी - फोटो : File Photo
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उनके शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित करने के संदर्भ में फेयर ने भी चेतावनी दी थी कि पाकिस्तानी सेना फिर से दो दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के बीच नए सिरे से शांति पहल को विफल करने की कोशिश करेगी, क्योंकि शरीफ के भारत आने के बाद दोनों नेताओं के  बीच पहली द्विपक्षीय वार्ता हुई थी। उनकी यह आशंका सच भी  साबित हुई। 
 
सीमा पर चौकसी बढ़ानी होगी
पूर्व विदेश सचिव शशांक का मानना है कि इस बार यूएन में कश्मीर की बात करके पाकिस्तान ने तालिबान पर भी दबाव बनाकर रखने की कोशिश की है। एक तरह से पाकिस्तान ने तालिबान को यह संदेश दिया है कि हमने यूएन में बोल दिया और बाकी वह संभाले। इसके एवज में पाकिस्तान तालिबान को यूएन से समर्थन दिलाने की कोशिश कर सकता है। लिहाजा हमें अपने देश की सीमाओं की सुरक्षा और चौकसी से करने की जरूरत है। इजरायल के पास सुरक्षा के जिस तरह के आधुनिक तकनीक वाले उपकरण हैं उसका सहारा लेना चाहिए। ह्यूमन इंटेलिजेंस के संसाधन बढ़ाने पड़ेंगे और इन सभी मामलों पर त्वरित फैसले लेने की जरूरत है। 

जैनी बताते हैं कि इसकी एक और वजह यह है कि पाकिस्तान खुद को इस्लामिक देशों के संगठन का मुखिया मानता है अब वहां अपना रौब बनाए रखने के लिए वह यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर की बात करता है। अब उसकी रणनीति तालिबान को अपने दबदबे में रखने की है इसलिए उसने फिर से ऐसा शगूफा छेड़ा है। 





 
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