यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के क्रिश्चियन रोमन ने कहा, एक ही जगह पर 19 अलग अलग जलवायु कारकों में परिवर्तन का विश्लेषण करने के बाद प्रजातियों के विलुप्त होने का कारण पता लगाया जाएगा। साथ ही यह भी पता लगाया जाएगा कि वहां की आबादी कितना जलवायु परिवर्तन बर्दाश्त कर सकती है।
शोध के दौरान यह अनुमान भी लगाया गया कि तापमान से बचने के लिए आबादी कितनी जल्द एक जगह से दूसरी जगह जा सकती है। आबादी कितने समय में विलुप्त होगी यह समझने के लिए किसी स्थान का वार्षिक अधिकतम तापमान यानी गर्मियों के मौसम में बढ़ता पारा मुख्य कारक है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जहां स्थानीय प्रजातियां विलुप्त हुईं वहां औसत वार्षिक तापमान में कम बदलाव देखा गया। शोध में पाया गया कि अधिकतर प्रजातियां अधिकतम तापमान में वृद्धि को बर्दाश्त करने में सक्षम थीं लेकिन एक स्तर तक।
अधिकतम तापमान में वृद्धि 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि पर 50 फीसदी प्रजातियां स्थानीय स्तर पर विलुप्त हुईं। वहीं अगर तापमान वृद्धि 2.9 डिग्री से अधिक हुई तो 95 फीसदी प्रजातियां विलुप्त हुईं। शोधकर्ताओं के मुताबिक प्रजातियों के नुकसान के अनुमान इस बात पर निर्भर करते हैं कि भविष्य में जलवायु कितनी गर्म होगी।
शोध में दावा किया गया कि अगर पेरिस समझौते पर कायम रहा गया तो 2070 तक पौधों व पशुओं की हर 10 में दो से कम प्रजातियों को हम खो सकते हैं। पेरिस समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य रखा गया है।