अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार की घोषणा के साथ ही आतंकी साए को लेकर बहस तेज हो गई है। रक्षा और राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान की धरती पाकिस्तान से आंतकी नेटवर्क चलाने वाले संगठनों के लिए नया आश्रय स्थल या गढ़ बन सकती है।
तालिबान को इस बार सत्ता संभालने में होगी मुश्किल
एम्सटरडैम के थिंक टैंक यूरोपीयन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज ने बुधवार को वेबिनार में ये बात कही। अफगानिस्तान की खनन और पेट्रोलियम मंत्री नरगिस नेहान ने कहा कि तालिबान सरकार में महिलाओं को भागीदारी देने के मामले में फेल हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार का तालिबान 2011 की तुलना में पूरी तरह अलग है। संभव है कि इस बार उसे सत्ता संभालने में कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़े लेकिन इसका सीधा नुकसान अफगानिस्तान होगा। वो भी तब जब दुनिया के दूसरे देश अफगानिस्तान पर सिर्फ नजर बनाए हुए हैं।
आईएसआई आंतक का शार्गीद
सेंटर फॅॉर स्टडी ऑफ क्राइसेस एंड इंटरनेशनल कॉनफिलक्ट्स की डॉ. दोरोथे वंदामे का कहना है कि पाकिस्तान की सेना वैसे तो पाकिस्तान में है लेकिन वो उतनी ही बाहर भी है। उन्होंने आईएसआई पर निशाना साधते हुए कहा कि आईएसआई राजनीतिक हिंसा फैलाने का माहिर है। आईएसआई दहशतगर्दों का शार्गीद है। वो आतंक को नए अंजाम तक पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल करने में संकोच नहीं करेगा।