यूरोपियन यूनियन (ईयू) के लिए व्यापार समझौते करना लगातार मुश्किल हो जाता रहा है। हाल की घटनाओं से ये राय यहां बनी है। जब ज्यां-क्लाउड जंकनर यूरोपीय आयोग के अधयक्ष थे, तो उस दौर में ईयू ने कनाडा, जापान, वियतनाम, सिंगापुर, और मेक्सिको के साथ व्यापाक समझौते किए थे। लेकिन हाल में ईयू ने जिन व्यापार समझौतों की कोशिश की, वे सफल नहीं रहे हैं। इनमें चीन और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ हुए व्यापार समझौते प्रमुख हैं, जिन्हें लागू नहीं किया जा सका है। भारत के साथ भी उसका प्रस्तावित व्यापार समझौता लटका हुआ है।
विश्लेषकों कहना है कि व्यापार समझौतों की राह में नई मुश्किलें यूरोप में जलवायु परिवर्तन, ट्रेड यूनियन, और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बढ़े प्रभाव के कारण पैदा हुई हैं। उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश में ईयू को हाल में दो व्यापार समझौतों पर अमल रोकना पड़ा। इनमें एक चीन के साथ हुआ व्यापक निवेश समझौता है, जिसकी राह में चीन में मानव अधिकारों का कथित दमन रुकावट बन गया। दूसरा समझौता ब्राजील के साथ हुआ, जिस पर अमल में अमेजन जंगलों की कटाई का सवाल बाधक बन गया।
विश्लेषकों ने कहा है कि अब यूरोपीय देशों में अधिक संरक्षणवादी नीतियां भी अपनाई जा रही हैं। यूरोपीय देश अपने उद्योगों को संरक्षण दे रहे हैं और तकनीक ट्रांसफर में हिचक रहे हैं। यह भी व्यापार समझौतों की राह में रुकावट बन रहा है। ईयू का अपना ढांचा भी ऐसा है, जिसमें समझौतों को अमल से पहले कई चरणों के परीक्षण से गुजरना पड़ता है। मसलन, अगर यूरोपीय आयोग किसी समझौते पर मुहर लगा देता है, तब भी यूरोपीय संसद की मंजूरी समस्या बनी रहती है। चीन से हुआ निवेश समझौता यूरोपीय संसद में ही जाकर अटक गया।