पोलैंड के संवैधानिक न्यायालय के एक फैसले से यूरोपियन यूनियन (ईयू) के साथ पोलैंड का एक नया टकराव खड़ा हो गया है। संवैधानिक अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि पोलैंड सरकार न्यायिक सुधार के बारे में ईयू के आदेशों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। इस बारे में पोलैंड के प्रधानमंत्री मोराविकी ने पहले ही यह कहा था कि पोलैंड की न्यायपालिका में सुधार के लिए उठाए गए कदमों पर ईयू को दखल देने का कोई हक नहीं है।
पोलैंड और ईयू के बीच इस मुद्दे पर विवाद पिछले पांच साल से चल रहा है। पोलैंड की नई व्यवस्था में सरकार को अदालती मामलों में काफी अधिकार मिले गए हैं। कंजरवेटिव लॉ एंड जस्टिस पार्टी ने सत्ता में आने के बाद से इन अधिकारों का पूरा इस्तेमाल किया है। विरोधियों का आरोप है कि उसने कई मामलों में इन अधिकारों का दुरुपयोग किया है। ईयू की समझ रही है कि पोलैंड की सरकार के कदमों से देश की न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई है। गौरतलब है कि पोलैंड ईयू के सदस्य देशों के बीच पांचवां सबसे बड़ा देश है।
यह विवाद पोलैंड सरकार की तरफ से बनाए एक कानून के बाद खड़ा हुआ था। उस कानून के तहत जजों को दंडित करने का अधिकार सरकार को मिल गया। कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ द ईयू (ईयू की अदालत) ने पोलैंड सरकार को इस कानून को निलंबित करने का आदेश दिया। जब पोलैंड की सरकार ने इस आदेश के खिलाफ देश की संवैधानिक अदालत में अपील की। ईयू में आम धारणा है कि पोलैंड की मौजूदा सरकार ने संवैधानिक अदालत में अपने वफादार जज नियुक्त कर रखे हैं।
बुधवार को संवैधानिक अदालत ने अपना फैसला सुनाया। उसने कहा कि कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ द ईयू (सीजेईयू) को पोलैंड में लाए गए न्यायिक बदलावों के मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। जबकि इस मामले में सरकार विरोधी वकीलों ने कोर्ट में दलील पेश की थी कि अगर फैसला सीजेईयू के खिलाफ गया, तो उसके दूरगामी नतीजे होंगे। उससे संभव है कि ईयू में पोलैंड की स्थिति पर सवाल खड़े हो जाएं।
उधर प्रधानमंत्री मोराविकी की पार्टी लंबे समय से दलील देती रही है कि पोलैंड की न्यायपालिका में परिवर्तन की जरूरत है, ताकि उसे ज्यादा कुशल बनाया जा सके। ताजा फैसला आने के बाद सत्ताधारी पार्टी के नेता जानुस्ज कोवाल्स्की ने कहा- ‘यह सही समय है जब सीजेईयू को साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए, जिसके वह लायक है। उसके राजनीति प्रेरित जजों के गैर कानूनी आदेशों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देने की जरूरत है।’
लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस फैसले से पौलैंड की सत्ताधारी पार्टी को बल मिलेगा, जो पहले से ही तानाशाही तरीके अपनाती गई है। सीजेईयू के एक और आदेश का मामला पोलैंड की संवैधानिक अदालत के सामने लंबित है। इसके तहत सीजेईयू ने जजों को दंडित करने के लिए बनाए गए डिस्पिलिनरी चैंबर को भंग करने का आदेश दिया था। सीजेईयू ने कहा था कि इस चैंबर का गठन ईयू के लिए हुई संधि के प्रावधानों का उल्लंघन है।