डीडब्ल्यू के विश्लेषण के मुताबिक मतदाताओं की संख्या घटने की वजह से देश में जन्म से ज्यादा हो रही मौतें हैं। इसके मुताबिक आव्रजन के कारण जर्मनी की आबादी स्थिर दिखती है। लेकिन आव्रजकों में ऐसे लोगों की संख्या काफी है, जिन्हें वोट डालने का अधिकार हासिल नहीं है। इस वजह से मतदाताओं की संख्या घटती जा रही है। साथ ही, मतदाताओं की औसत उम्र भी लगातार बढ़ रही है।
इस विश्लेषण के मुताबिक 1987 में तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी में 23 फीसदी मतदाता 30 साल से कम उम्र के और 26 फीसदी 60 साल से अधिक उम्र के थे। 2021 के चुनाव में 30 साल से कम उम्र के मतदाताओं की संख्या 15 फीसदी और 60 साल से अधिक उम्र के मतदाताओं की संख्या 38 फीसदी हो गई है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक जर्मनी के उम्रदराज वोटरों में अपनी पसंद की पार्टी के प्रति वफादारी का भाव ज्यादा रहता है। जबकि युवा मतदाताओं की पसंद बदलती रहती है। उम्रदराज मतदाता वोट डालने भी अधिक संख्या में आते हैं। 2017 के चुनाव में 70 साल से अधिक उम्र के मतदाताओं में से 81 फीसदी ने वोट डाले थे। जबकि 21 से 24 वर्ष उम्र के मतदाताओं में यह प्रतिशत सिर्फ 67 रहा था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक उम्रदराज मतदाता आम तौर पर सीडीयू या एसपीडी को वोट डालते हैं। लेकिन पिछले 30 साल में उनका ज्यादा झुकाव सीडीयू की तरफ रहा है। सीडीयू की उम्मीदें अब इसी पहलू पर टिकी हैं। जानकारों का कहना है कि जनमत सर्वेक्षणों में अकसर युवा मतदाताओं की भी राय ली जाती है। लेकिन चुनाव नतीजों में उनकी राय नहीं झलकती। ऐसा इस बार भी हो सकता है। ये संभव है कि उम्रदराज मतदाता बड़ी संख्या में मतदान कर अरमिन लैशेट को विजयी बना दें। फिलहाल, जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक वे शोल्ज से पांच फीसदी से भी ज्यादा अंतर से पिछड़े हुए हैं।