पर्यवेक्षकों के मुताबिक इन हालात के साथ अगर मताधिकार संकुचित करने की रिपब्लिकन पार्टी शासित राज्यों में चल रही कोशिशों को भी जोड़ कर देखा जाए, तो गहराते संकट का अंदाजा लगता है। कुछ मीडिया विश्लेषणों में कहा गया है कि 2022 के संसदीय चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी कई सीटें सिर्फ मताधिकार को संकुचित करने और रिपब्लिकन राज्यों में चुनाव क्षेत्रों की सीमा फिर से तय करने के कारण हार जाएगी।
विश्लेषकों ने कहा है कि इनमें से हर मुद्दा जो बाइडन की नेतृत्व क्षमता के लिए कड़ा इम्तिहान बन गया है। उन्होंने ध्यान दिलाया है कि बाइडन की छवि एक इस्टैब्लिशमेंट राजनेता की है, जिनकी खूबी सबको साथ लेकर चलना रही है। लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के अपने धुर दक्षिणपंथी एजेंडे पर अड़े रहने के कारण बाइडन को उसके साथ आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर आम सहमति बनाने में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली है। इसी बीच डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर उनके ‘सबको साथ ले कर चलने’ के नजरिए को लेकर विवाद बढ़ गया है।
विश्लेषकों के मुताबिक कांग्रेस (संसद) के ऊपरी सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी का निर्णायक बहुमत ना होना और सुप्रीम कोर्ट के कंजरवेटिव जजों की सक्रियता से बाइडन प्रशासन के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। सीनेट में दोनों पार्टियों के 50-50 सदस्य हैं। उप-राष्ट्रपति के अतिरिक्त वोट से बाइडन प्रशासन अपने वैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ा सकता है। लेकिन जो मेंचिन और क्रिस्टीन सिनेमा जैसे दक्षिणपंथी डेमोक्रेटिक सीनेटरों के अलग रुख अपना लेने के कारण अब ऐसा करना बेहद मुश्किल हो गया है। उधर सुप्रीम कोर्ट गर्भपात और मताधिकार जैसे मुद्दों पर रिपब्लिकन एजेंडे का सहायक बन गया है। इससे जो बाइडन की स्थिति एक ऐसे पंगु राष्ट्रपति जैसी होती जा रही है, जो अपने एजेंडे को लागू करने में अक्षम दिख रहा है।