एसोसिएशन ऑफ साउथ-ईस्ट एशियन नेशंस (आसियान) और चीन के बीच दक्षिण चीन सागर के लिए एक आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) पर सहमति बनाने की कोशिश फिर चर्चा में है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस बारे में सहमति बनने के रास्ते में कई रुकावटें हैं। इनकी वजह से इस बारे में बातचीत फिलहाल ठहरी हुई है। आसियान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बारे में कहा है- ‘आचार संहिता पर बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण बनाना जरूरी है।’
विश्लेषकों का कहना है कि आसियान के कई देश अमेरिकी प्रभाव में हैं। इसके अलावा वियतनाम जैसा देश है, जो आसियान और आचार संहिता का उपयोग अपने फायदे के लिए करने की कोशिश में है। पारासेल द्वीपों को लेकर वियतनाम का चीन से विवाद है। वह जोर डाल रहा है कि पारासेल द्वीपों और उनकी तटीय समुद्री सीमा तय करने का मसला भी आचार संहिता में शामिल किया जाए। जबकि चीन इन द्वीपों पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है। जानकारों का कहना है कि यह विवाद आचार संहिता के रास्ते में एक बड़ी रुकावट है।
चीन का पक्ष है कि द्विपक्षीय विवादों को संबंधित देशों की आपसी बातचीत से हल किया जाना चाहिए। इसमें किसी तीसरे पक्ष का दखल नहीं होना चाहिए। आचार संहिता के ड्राफ्ट में यह कहा गया था कि विवादों से संबंधित पक्ष दोस्ताना बातचीत से उन्हें हल करने की कोशिश करेंगे। चीन का आरोप है कि आसियान के सदस्य कई देशों ने इस भावना का पालन नहीं किया है।
उधर इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित आचार संहिता का कानूनी दर्जा क्या होगा। क्या इसे वही दर्जा मिलेगा, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी संधि का होता है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि की बढ़ती भूमिका ने भी हालत को उलझा दिया है। इस क्षेत्र में अब इन देशों की अनदेखी करते हुए कोई ऐसा समझौता होना मुश्किल है, जिनका संबंध रक्षा से जुड़े मसलों से हो।