विश्लेषकों के मुताबिक ये संकट कई कारणों से खड़ा हुआ है। उनमें कोरोना महामारी के बाद अर्थव्यवस्थाओं के खुलने से बढ़ रही मांग एक बड़ी वजह है। कोयले की कीमत में अचानक हुई तेज बढ़ोतरी ने संकट को और पेचीदा बना दिया है। पश्चिमी देशों और चीन में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए अपनी गई नीतियों की वजह से भी ये संकट बढ़ा है। चीन ने इस मकसद से अपने कई कोयला खदान बंद कर दिए थे। वहां अब उन्हें दोबारा चालू करने की मांग उठ रही है।
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक खबर के मुताबिक रूसी गैस उत्पादक कंपनी गैजप्रोम गैस की कीमत और बढ़ाने की तैयारी में है। गैजप्रोम यूरोप में गैस की प्रमुख सप्लायर कंपनी है। उधर अमेरिका की लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) की सप्लायर कंपनियां मांग के मुताबिक गैस की सप्लाई नहीं कर पा रही हैं। यूरोप और अमेरिका में सर्दी का मौसम करीब आ रहा है। उससे मांग और बढ़ गई है।
ब्रिटेन के पास उत्तरी सागर में गैस के बड़े भंडार हैं। लेकिन उसने वहां से गैस निकालने का काम रोक दिया था। इसलिए वह पश्चिम एशिया से होने वाली एलएनजी की सप्लाई पर अधिक निर्भर हो गया। थिंक टैंक ऑक्सफॉर्ड इकोनॉमिक्स में प्रमुख ऊर्जा अर्थशास्त्री टॉबी ह्विटिंग्टन के मुताबिक यूरोप और एशिया में पिछले 12 महीनों के दौरान गैस की कीमतों में पांच गुना इजाफा हुआ है। उन्होंने द गार्जियन से कहा- ‘प्राकृतिक गैस से विश्व बाजार में एक तूफान आया हुआ है।’