ऐसा लगता है कि चीन के लोगों को ये नीति पसंद आ रही है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी पिउ रिसर्च सेंटर के एक सर्वे से सामने आया है कि चीन की 48.2 फीसदी आबादी किसी ना किसी धर्म में आस्था रखती है। चीनी इतिहास के जानकारों के मुताबिक चीन में प्राचीन काल से ज्यादातर लोग किसी एक खास धर्म का पालन नहीं करते थे। बल्कि वे विभिन्न प्रकार की आस्थाओं और धार्मिक प्रथाओं के साथ जीते थे। ऐसे लोग बड़ी संख्या में थे, जो एक साथ बौद्ध, कॉन्फ्यूशियस और ताओ पंथ का पालन करते थे। चीन के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरह की प्रथाएं थीं।
बीती सदी में कम्युनिस्ट पार्टी प्राचीन दार्शनिक कंफ्यूशियस की शिक्षाओं की कड़ी आलोचक थी। लेकिन अब पार्टी ने ये आलोचना छोड़ दी है। इससे हाल में कंफ्यूशियस की शिक्षाओं को मानने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। खबरों के मुताबिक अब खुद सरकार कंफ्यूशियस के मंदिरों और उनसे जुड़े संस्थानों की स्थापना में मदद कर रही है। कंप्यूशियस की शिक्षाओं पर आयोजित समारोहों को उसने प्रायोजित भी किया है।
ये नया बदलाव है। अभी 2015 में चीन सराकर ने लगभग 1,200 चर्चों पर से क्रॉस हटवा दिए थे। तब झेजियांग प्रांत में एक क्रॉस हटाने का विरोध करने वाले एक पादरी को 14 साल की कैद सुनाई गई थी। 2018 में शांक्सी प्रांत में एक चर्च तोड़ने की घटना हुई थी। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अब जबकि कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना की 100 सालगिरह मना रही है, तब वह दुनिया के सामने पूरे चीन की एकजुटता दिखाने की कोशिश में है। इसी प्रयास में सभी धर्मावलंबियों को साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है। विश्लेषकों का कहना है कि इससे देश में धार्मिक पुनरुत्थान का दौर शुरू हो गया है।