ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन
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ब्रिटेन की सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों ने उन कंपनियों से 13 लाख पाउंड के उपहार स्वीकार किए हैं, जिनके स्वार्थ जीवाश्म ऊर्जा (फॉसिल फ्यूअल) इंडस्ट्री से जुड़े हैं। ये उपहार 2019 के आम चुनाव के बाद लिए गए। ये बात ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने अपने एक अनुसंधान के आधार पर बताई है। अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिन कंपनियों ने इन सांसदों को ‘उपकृत’ किया, उनमें कच्चे तेल, गैस, और हवाई अड्डा कारोबार से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं।
कंपनियों ने दिया आठ लाख 12 हजार पाउंड का चंदा
अखबार का कहना है कि इन कंपनियों ने जो चंदा या उपहार दिए, उनकी सूचना निर्वाचन आयोग या संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमंस की संबंधित समिति को दी गई। यानी यह पूरी तरह वैधानिक है। सांसदों के अलावा सीधे कंजरवेटिव पार्टी को इन कंपनियों ने आठ लाख 12 हजार पाउंड दिए। जबकि इन कंपनियों से विपक्षी लेबर पार्टी को सिर्फ 18,400 पाउंड मिले। इन कंपनियों ने नेताओं को व्यक्तिगत रूप से जो चंदा दिया, उसका 99 फीसदी हिस्सा कंजरवेटिव नेताओं के पास गया।
द गार्जियन ने कहा है कि उसके शोध से देश में वैध ढंग से हो रही सियासी लॉबिंग पर रोशनी पड़ी है। ये कंपनियां सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए बड़ी रकम चंदे या उपहार के रूप में दे रही हैं। इनके अलावा कुछ ऐसे संगठन भी हैं, जो अवैध या अनैतिक ढंग से भी नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
कंजरवेटिव पार्टी के कई सांसदों ने ग्लोबल वॉर्मिंग पॉलिसी फाउंडेशन नाम के एक थिंक टैंक से भी चंदा लिया है। ये थिंक टैंक यह प्रचार करता है कि जलवायु परिवर्तन की बात निराधार है। इसके अलावा तेल और कोयला उद्योग में हित रखने वाली कंपनियां भी जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों की समझ से अलग नीतियां अपनाने के लिए सांसदों को प्रभावित करती हैं। जिन सांसदों ने ऐसे स्रोतों से पैसा लिया है, उनमें से कई वर्तमान ब्रिटिश सरकार में प्रभावशाली पदों पर हैं।
बोरिस जॉनसन सरकार की आलोचना
द गार्जियन ने ऐसे नेताओं की एक सूची छापी है। साथ ही यह बताया है कि उन्हें किस कंपनी से कितना चंदा मिला। लेकिन द गार्जियन के विश्लेषकों ने कहा है कि अमेरिका की तरह ब्रिटेन में जलवायु परिवर्तन को लेकर दोनों प्रमुख पार्टियों में ज्यादा मतभेद नहीं है। कंजरवेटिव पार्टी के भी ज्यादातर सांसद यह मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है, जिसके नतीजे सामने आ रहे हैं।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि बोरिस जॉनसन सरकार के कई कदम इस समझ के विपरीत हैं। मसलन, जॉनसन सरकार ने उत्तरी सागर में तेल और गैस को निकालने और हवाई अड्डों के निर्माण को समर्थन देना जारी रखा है। साथ ही उसने कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्रों के मामले में अस्पष्ट नीति अपना रखी है।
विश्लेषकों का कहना है कि राजनेता जो चंदा लेते हैं, उसकी वजह से सरकारी नीतियां कितनी प्रभावित होती हैं, इसे सबूत के साथ कह पाना मुश्किल है। पर्यावरण संबंधी अनुसंधान करने वाली संस्था डीस्मॉग से जुड़े विशेषज्ञ रिच कॉलेट-व्हाइट की राय है कि चंदा लेने के बाद नेताओं में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए महत्त्वाकांक्षी कदम उठाने का उत्साह नहीं रहता। उन्होंने कहा- ‘सरकार चंदा देने वालों के हितों के खिलाफ जाकर भी पर्यावरण हितैषी नीतियां अपना सकती है। लेकिन असल सवाल यह है कि कंजरवेटिव पार्टी इन कंपनियां की पहली पसंद क्यों है?’