अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने पाकिस्तान के लिए कर्ज का भुगतान रोक रखा है। फिलहाल, एक अरब डॉलर की रकम का भुगतान रुका हुआ है। आईएमएफ का कहना है कि वह तब तक कर्ज की ये खेप जारी नहीं करेगा, जब तक पाकिस्तान सरकार सेना के कमर्शियल बैंक खातों को बंद नहीं करती। साथ ही 17 अरब डॉलर के सार्वजनिक कोष को एक ट्रेजरी अकाउंट में ट्रांसफर नहीं करती। इसके अलावा आईएमएफ की मांग है कि पाकिस्तान अपने केंद्रीय बैंक को अधिक स्वायत्तता दे।
लेकिन वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय सहायता के इस मसले ने अब भू-राजनीतिक मोड़ ले लिया है। आईएमएफ के बारे में आम समझ है कि अमेरिका इसके जरिए विभिन्न देशों पर अपना एजेंडा थोपता है। आईएमएफ को सबसे ज्यादा धन अमेरिका ही देता है। अब खबर है कि जो बाइडन प्रशासन आईएमएफ की प्रस्तावित वित्तीय सहायता का इस्तेमाल अफगानिस्तान के मामले में पाकिस्तान पर अपनी शर्तें थोपने के लिए कर रहा है। वह चाहता है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद-विरोधी कार्रवाइयों में पाकिस्तान सक्रिय भूमिका निभाए।
बाजार विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान के शेयर और मुद्रा बाजारों में आर्थिक जगत का भरोसा तेजी से खत्म हो रहा है। इसलिए पाकिस्तान को आईएमएफ की सहायता की तुरंत जरूरत है। पाकिस्तान के राजनीतिक दायरों में आम शिकायत है कि अमेरिका ये सहायता रोक कर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा रहा है। यहां के विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान ने उम्मीद की थी कि जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने पर दोनों देशों के संबंधों में एक नया दौर शुरू होगा। लेकिन असल में इसमें कोई फर्क नहीं पड़ा है।
पिछले हफ्ते अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट बताया गया था कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच एक समझौता होने वाला है। सीएनएन ने ये खबर अमेरिकी कांग्रेस के सामने बाइडन प्रशासन के अधिकारियों की गवाही के आधार पर दी। उसके मुताबिक उन अधिकारियों ने बताया कि प्रस्तावित समझौते के तहत अफगानिस्तान में उग्रवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के वायु क्षेत्र का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलेगा। सीएनएन ने बताया कि पाकिस्तान ने ये अधिकार देने के बदले कुछ मांगें रखी हैं।