पाकिस्तान सरकार का नजरिया अफगानिस्तान के तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के प्रति अलग रहा है। अफगान तालिबान को उसका संरक्षण रहा है, जबकि टीटीपी को वह दुश्मन समझती रही है। टीटीपी ने गुजरे वर्षों में पाकिस्तान के अंदर कई भयानक हमले किए हैं। इसीलिए इस खबर को लेकर यहां कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि आखिर क्यों सरकार ने टीटीपी के 100 बंदियों को रिहा करने का फैसला किया? सरकार ने कहा है कि ऐसा उसने सद्भावना दिखाने के लिए किया है।
कैदियों की रिहाई को इस खबर की पुष्टि के तौर पर देखा गया है कि इमरान खान सरकार और टीपीपी के बीच किसी स्थायी समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। हालांकि सरकार की तरफ से ये सफाई दी गई है कि ये रिहाई टीटीपी की किसी मांग को पूरा करने के लिए नहीं हुई है।
इसके पहले इस महीने की आठ तारीख को टीटीपी ने एलान किया था कि उसकी एक महीने के युद्धविराम के लिए सरकार के साथ सहमति बन गई है। तब टीटीपी ने कहा था कि अगर दोनों पक्ष सहमत हुए तो युद्धविराम की अवधि और बढ़ाई जाएगी। साथ ही उसने जोर दिया था कि एक दूसरे पर हमला ना करने की बनी सहमति दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होगी।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि टीटीपी ने शांति समझौते पर बातचीत करने के लिए सरकार के सामने तीन मांगें रखी हैं। वह चाहता है कि उसे किसी तीसरे देश में अपना राजनीतिक दफ्तर खोलने दिया जाए, पूर्व संघीय शासित क्षेत्र- एफएटीए के खैबर- पुख्तूनवा प्रांत में हुए विलय को रद्द किया जाए, और पाकिस्तान में शरिया कानून लागू किया जाए। बताया जाता है कि पाकिस्तान सरकार ने इन मांगों को मानने से इनकार कर दिया है।
शरिया कानून के बारे में सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य है, जहां सारे कानून इस्लाम की शिक्षाओं के मुताबिक बनाए गए हैँ। लेकिन तालिबान की व्याख्या के मुताबिक शरिया कानून पाकिस्तान में लागू करना संभव नहीं है।