क्या पश्चिम एशिया में एक नया बड़ा टकराव शुरू होने वाला है? क्या ईरान की सबसे बड़ी आर्थिक जीवनरेखा पर हमला हुआ है? फारस की खाड़ी में मौजूद एक छोटा सा द्वीप लेकिन उसकी अहमियत इतनी कि उससे पूरे ईरान की अर्थव्यवस्था जुड़ी है। क्या यही कारण है की अमेरिका ने इस द्वीप पर हमला किया है? अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि ईरान के बेहद अहम तेल केंद्र खर्ग द्वीप को निशाना बनाया गया है।
तो क्या सचमुच ईरान के तेल निर्यात की रीढ़ पर चोट की गई है? अगर इस द्वीप को बड़ा नुकसान हुआ है तो क्या दुनिया की तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है?
और क्या इससे पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा और बढ़ सकता है? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अगर ईरान की तेल लाइफलाइन पर हमला हुआ है, तो उसका जवाब क्या होगा?
दरअसल, पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने ईरान के लिए बेहद अहम माने जाने वाले खर्ग द्वीप पर हमले का दावा किया है। यह द्वीप ईरान के तेल निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है और इसी वजह से इसे कूटनीतिक तौर पर ईरान की जीवनरेखा कहा जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए दावा किया कि अमेरिकी हमले में इस द्वीप को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि अमेरिका का कहना है कि हमले में ईरान के सैन्य ठिकानों को ही निशाना बनाया गया।
खर्ग द्वीप फारस की खाड़ी में स्थित एक छोटा सा द्वीप है, जो ईरान की मुख्य भूमि से करीब पचास किलोमीटर दूर है। आकार में यह द्वीप महज छह से आठ किलोमीटर लंबा है, लेकिन रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से इसका महत्व बेहद बड़ा है।
दरअसल, ईरान के तेल व्यापार का सबसे बड़ा हिस्सा इसी द्वीप से संचालित होता है। जानकारी के अनुसार ईरान के कुल कच्चे तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा खर्ग द्वीप के टर्मिनलों से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है। यही कारण है कि इस द्वीप को ईरान की अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है।
इस द्वीप पर बने तेल निर्यात टर्मिनलों में प्रतिदिन करीब 70 लाख बैरल कच्चा तेल लोड करने की क्षमता है। यहां बड़े-बड़े तेल भंडारण टैंक भी मौजूद हैं, जहां लगभग 180 लाख बैरल कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है। इसके अलावा समुद्र के नीचे बिछी पाइपलाइनों के माध्यम से यह द्वीप दक्षिणी ईरान के प्रमुख तेल क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
खर्ग द्वीप का एक और अहम पहलू यह है कि ईरान की अधिकतर तटरेखा उथली है, जहां बड़े जहाजों और तेल टैंकरों का रुकना मुश्किल होता है। जबकि खर्ग द्वीप गहरे समुद्री इलाके के करीब स्थित है, जिसके कारण यहां बड़े-बड़े तेल टैंकर आसानी से लंगर डाल सकते हैं और तेल की लोडिंग की जा सकती है।
इतिहास की बात करें तो खर्ग द्वीप पर तेल निर्यात टर्मिनल का निर्माण एक समय अमेरिकी तेल कंपनी ने किया था। वर्ष 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद इस द्वीप और उसके तेल ढांचे को ईरान की सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया था।
खर्ग द्वीप से निर्यात होने वाले तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन माना जाता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान इसी रास्ते से चीन को तेल निर्यात कर बड़ी मात्रा में राजस्व अर्जित करता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खर्ग द्वीप पर हमला गंभीर रूप से तेल आपूर्ति को प्रभावित करता है तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
इस हमले के बाद ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने चेतावनी दी है कि अगर उसके तेल या आर्थिक ढांचे को निशाना बनाया गया तो वह पूरे पश्चिम एशिया में अमेरिकी ठिकानों और अमेरिकी कंपनियों के तेल ढांचों पर जवाबी कार्रवाई कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि खर्ग द्वीप पर हमला पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव को और बढ़ा सकता है। ऐसे में दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में आगे बढ़ता है।