बलिदान, मृत्यु और वीरता के बीच अंतरसंबंधों का प्रदर्शन बताता है कि नश्वरता और अनश्वरता के बीच की बाधा को पार करके मिलने वाली स्वतंत्रता का आनंद लेने के लिए व्यक्ति को वीरतापूर्वक मृत्यु का वरण करना चाहिए। कर्ण के लिए दैवी पितृत्व से मिली अमरता वीरतापूर्ण बलिदान व दान कार्य से कम महत्वपूर्ण है। नागरी नाटक मंडली के मंच पर कर्णगाथा में दर्शकों को इसका अहसास हुआ।