रसोई गैस सिलिंडर की किल्लत का असर अब धार्मिक आयोजनों और आस्था से जुड़े कार्यक्रमों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। वर्षों से बड़े मंगल पर होने वाले भंडारों का स्वरूप इस बार बदला-बदला नजर आ रहा है। शहर के गुरुनानक चौराहे पर पिछले करीब 30 वर्षों से आयोजित होने वाला पारंपरिक भंडारा इस बार बिना पूड़ी-सब्जी, छोला-चावल और हलुए के आयोजित करना पड़ा। भंडारे की आयोजक संगीता अग्रवाल ने बताया कि गैस सिलिंडर उपलब्ध न होने के कारण भोजन तैयार कराना संभव नहीं हो सका। मजबूरी में इस बार श्रद्धालुओं को केला, शर्बत और बिस्कुट वितरित किए जा रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि अगले मंगलवार तक गैस की व्यवस्था हो गई तो भोजन प्रसाद का भंडारा दोबारा शुरू किया जाएगा। गैस संकट का असर सिर्फ एक आयोजन तक सीमित नहीं है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में बड़े मंगल पर लगने वाले भंडारों की संख्या भी लगभग आधी रह गई है। कई आयोजकों ने सिलिंडर न मिलने और महंगे दामों पर गैस उपलब्ध होने की समस्या बताते हुए इस बार आयोजन छोटा कर दिया है। श्रद्धालुओं का कहना है कि बड़े मंगल पर भंडारे केवल भोजन वितरण का माध्यम नहीं बल्कि आस्था, सेवा और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक होते हैं। ऐसे में गैस संकट के कारण परंपराओं पर पड़ रहा असर लोगों को परेशान कर रहा है।