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चंदौली: मिट्टी के दीयों से जगमगाएगा बाजार, टांडाकला के कुम्हार दिन-रात कर रहे मेहनत

दीपावली नजदीक आते ही टांडाकला में कुम्हारों के चाक की रफ्तार तेज हो गई है। रोशनी के इस पर्व पर घरों को जगमग करने वाले मिट्टी के दीये बनाने में कारीगर दिन-रात जुटे हैं। त्योहार पर दीयों की बढ़ती मांग को देखते हुए परिवार के सदस्य भी उत्पादन में सहयोग कर रहे हैं। छोटे प्रजापति अपने बच्चों के साथ दीये बना रहे हैं, वहीं राजू प्रजापति की बेटियां भी चाक पर मिट्टी को आकार देकर सुंदर दीये तैयार कर रही हैं। मांग इतनी कि कम पड़ जाते हैं दीये टांडाकला निवासी छोटे प्रजापति ने बताया कि दीपावली पर आसपास के दर्जनों गांवों से लोग दीये खरीदने आते हैं। मांग इतनी अधिक रहती है कि गांव के सभी कुम्हार मिलकर भी इसकी पूरी आपूर्ति नहीं कर पाते। ऐसे में मांग पूरी करने के लिए बाहर से भी दीये मंगवाने पड़ते हैं। त्योहार के इस सीजन में परिवार के सभी सदस्य आजीविका चलाने और लोगों तक दीये पहुंचाने के लिए मेहनत कर रहे हैं। बेटियां भी संभाल रहीं हुनर की जिम्मेदारी दीये बनाने में परिवार की महिलाएं और बेटियां भी पीछे नहीं हैं। राजू प्रजापति की बेटियां मिट्टी को आकार देकर दीये बना रही हैं। वहीं, छोटे प्रजापति अपने बच्चों के साथ इस काम में जुटे हैं। परिवार के सदस्यों की मेहनत से पारंपरिक कुम्हारी का हुनर अगली पीढ़ी तक पहुंच रहा है। दीयों के साथ बन रहे पारंपरिक खिलौने छोटे प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के दीयों के अलावा बच्चों के लिए गुल्लक, मिट्टी का जांत और घंटी जैसे पारंपरिक सामान भी बनाए जा रहे हैं। आधुनिक दौर में बाजार में प्लास्टिक और चाबी से चलने वाले खिलौनों की उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण अंचल में मिट्टी से बने पारंपरिक खिलौनों की मांग अब भी बनी हुई है। दीये खरीदने आने वाले लोग अपने बच्चों के लिए भी इन खिलौनों को खरीदते हैं। कुम्हार घर-घर जाकर भी दीये पहुंचाते हैं।

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