आज हर घर में बच्चों को चुप कराने या जिद से पीछा छुड़ाने के लिए माता-पिता मोबाइल पकड़ा देते हैं। नतीजतन आज दो से तीन वर्ष के बच्चों की बोलने की क्षमता प्रभावित हो रही है। स्कूल जाने वाले बच्चों में आत्मनियंत्रण, एकाग्रता और व्यवहारिकता समाप्त होती जा रही है। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला अस्पताल में चलने वाली ओपीडी में हर रोज 15 से 20 बच्चे इन्हीं समस्याओं से ग्रसित होकर आ रहे हैं। इन बच्चों की मानसिक स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि डॉक्टरों को इनकी सेहत में सुधार और मोबाइल की आदत छुड़वाने के लिए कई-कई महीनों तक काउंसलिंग करनी पड़ रही है। बीमार बच्चों के माता-पिता को भी काउंसलिंग के जरिए बदलाव की आदत डाली जा रही है। बाराबंकी से अमर उजाला के लिए प्रमन श्रीवास्तव की रिपोर्ट -