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Sirohi: अर्बुदांचल पहाड़ियों के बीच दो शेर पर कल्याणी रूप में विराजमान हैं मां भद्रकाली, जानिए मंदिर का इतिहास

Fri, 21 Feb 2025 05:43 PM IST
सिरोही ब्यूरो न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही

आज हम बात कर रहे हैं गुजरात सीमा से सटे सिरोही जिले की, जो अर्बुदांचल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसे देवभूमि और तपोभूमि भी कहा जाता है। यहां चारो ओर एक से बढ़कर एक प्राचीन मंदिर बने हुए हैं, जो अपना इतिहास समेटे हुए हैं। इनमें से एक अतिप्राचीन मंदिर जो आबूरोड शहर से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वैसे तो इस मंदिर की बहुत सारी विशेषताएं हैं। इनमें सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर मां भद्रकाली दो शेर पर सवार होने के साथ ही मां भक्तों के कल्याण के लिए कल्याणी रूप में विराजमान है।

आबूरोड शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर ऋषिकेश में मनोरम पहाड़ियों के बीच यह प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां शहर के रेलवे स्टेशन और रोडवेज बस स्टैंड दोनों ही जगहों से ऑटो या टैक्सियों के साथ खुद के वाहनों से आसानी से पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर का शिवपुराण में उल्लेख किया हुआ है। भद्रकाली मंदिर का इतिहास पांच हजार साल से भी ज्यादा पुराना है तथा यह अमरावती नगरी से जुड़ा हुआ है।

मान्यताओं के अनुसार, अमरावती नगरी के राजा अम्बरीष की कई साल की तपस्या से खुश होकर भगवान ऋषिकेश, कर्णिकेश्वर महादेव एवं मां काली प्रकट हुई थी। राजा ने मां भद्रकाली से उनके इसी स्वरूप में यहां विराजमान होने का वर मांगा था। उसके बाद से मां यहां भक्तों का कल्याण करने के लिए कल्याणी रूप में विराजमान है तथा दो शेरों पर सवार है। वर्तमान में यह मंदिर सिरोही देवस्थान बोर्ड के अधीन है।

गुजरात के ब्राह्मण समाज की कुलदेवी है मां भद्रकाली
मां भद्रकाली स्थानीय लोगों की तो आस्था का केंद्र है ही। इसके साथ ही समीपवर्ती गुजरात के सिद्धपुर एवं मेहसाणा के ब्राह्मण समाज की कुलदेवी हैं। ऐसे में वहां से काफी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शनों के लिए यहां आते हैं। वैसे तो यहां रोजाना दिनभर श्रद्धालुओं की आवाजाही लगी रहती है। लेकिन जब बात नवरात्रि की तो मंदिर परिसर में मेले सा माहौल बना रहता है। मंदिर के ठीक सामने की ओर श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशाला भी है। भद्रकाली मंदिर पराक्रमी राजा अम्बरीश द्वारा स्थापित है तथा इस मंदिर को अब तक चार बार बनाया जा चुका है। वर्तमान मंदिर करीब 300 साल पुराना है।

यह है मंदिर की विशेषताएं
राजा अम्बरीष ने मां भद्रकाली के मंदिर का निर्माण करवाया था और मां की हूबहू प्रतिमा की स्थापना करवाई थी। इसमें मां भद्रकाली हाथ में त्रिशूल, माला, घंटी और कमंडल धारण किए हुए हैं। मां भद्रकाली दो शेरों पर सवार हैं। दूसरी बार साधु संतों ने दूसरा मंदिर बनवाकर मां की प्रतिमा की स्थापना करवाई थी। इसके बाद तीसरी बार मंदिर बनवाकर मां की मूर्ति स्थापित करवाई गई थी। तीनों मंदिरों में प्रतिमा को पश्चिम मुखी विराजित किया गया था।

भद्रकाली ने राजा को स्वप्न में दिए थे दर्शन
प्राचीन कथा के अनुसार, प्राकृतिक आपदाएं आने के साथ मंदिर और प्रतिमा मिट्टी में दबने लगी। इस पर मां भद्रकाली ने तत्कालीन सिरोही रियासत के महाराव केसरी सिंह को स्वप्न में दर्शन देकर उनकी प्रतिमा के मिट्टी में दबने और नए मन्दिर में प्रतिमा स्थापित करने के लिए कहा था। इस स्वप्न के बाद 1916 में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। मौजूदा मंदिर में देवी मां की प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई गई थी। महाराव केसर सिंह ने पूर्वोन्मुखी प्रतिमा स्थापित करवाकर प्रतिष्ठा करवाई थी। पुराने दो मंदिरों में से एक मंदिर वर्तमान मन्दिर के पीछे और सबसे पुराना मंदिर वर्तमान मन्दिर के सामने सड़क के दूसरी तरफ पहाड़ी पर बना हुआ है।

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