ये रंग होली में न दिखेंगे मोहल्ले
हफ़्तों जगने से आँखों के नीचे
जो आहिस्ता गहराते हैं रंग तेरे,
सालों खनकने के बाद
उतरी चूड़ियों के खींचे
जो कलाई पे रह जाते हैं रंग तेरे,
ये रंग
होली में न दिखेंगे मोहल्ले।
मेरी माँ के नए लगे दाँतों का रंग,
तुम्हारे बाबूजी की
एडवेंचर किताबों का रंग,
दराज़ में रखे ताम्बे के सिक्कों की तरह
एक अजीब सी परत चढ़ गई है उन पे,
उन्हें धूप नहीं दिखाता कोई अब,
उस ताम्बे की परत पे जमे परतों के जो रंग हैं,
वो रंग
होली में न दिखेंगे मोहल्ले।
ये होली भी अजीब पर्व है, विदुषी,
जैसे हम कभी थे,
वैसे ही भूतगणों का दिन है ये,
देह और दाह का पर्व,
इसमें कचार और गुलाल यूँ सनता है
कि हर जगह हर जगह हो जाता है,
क्या तुम्हारे होंठ, क्या स्तनों के उभार,
क्या राहगीरों के जाँघों से रिसती रंग की धार,
पर वो महीन से रंग
जिनका पर्व नहीं होता,
जो कभी किसी के संग नहीं होता,
उन रंगों के चलो कोई नाम रखें
इस होली की रात।
क्या पता इस मोहल्ले भी धीरे धीरे
किसी होली
उठेगी उन रंगों की बात।
(परिकल्पना, लेखन और आवाज- अरविंद जोशी)