चार दिन पहले तक तस्वीर कुछ और थी। सरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बचाव में पूरी मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही थी। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि सिर्फ 24 घंटे के भीतर पूरा घटनाक्रम बदल गया? आखिर आईबी, गृह मंत्रालय और भाजपा-संघ की रिपोर्टों में ऐसा क्या था, जिसने सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया? आइए समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम की कहानी।
नीट पेपर लीक को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन ने धीरे-धीरे सरकार की चिंता बढ़ानी शुरू कर दी थी। शुरुआती दौर में सत्ता को भरोसा था कि समय के साथ प्रदर्शन कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, आंदोलन का दायरा बढ़ता गया और छात्रों का गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई देने लगा।
इसी बीच सरकार के पास लगातार खुफिया एजेंसियों और संगठनात्मक स्तर से रिपोर्टें पहुंचने लगीं, जिन्होंने पूरे घटनाक्रम को नए नजरिए से देखने की सलाह दी।
सबसे अहम मानी गई इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी की रिपोर्ट। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि अगर अगले 48 घंटों के भीतर कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो आंदोलन सरकार के नियंत्रण से बाहर जा सकता है। इनपुट में यह भी कहा गया कि रविवार और सोमवार तक स्थिति नहीं संभली, तो देशभर में छात्रों का प्रदर्शन और व्यापक रूप ले सकता है।
यानी मामला सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रह गया था।
उधर गृह मंत्री अमित शाह की ओर से प्रधानमंत्री को सौंपी गई रिपोर्ट में भी चिंता जताई गई। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि आंदोलन लंबा खिंचता है तो विपक्षी दल फिर से एकजुट हो सकते हैं और सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक अभियान खड़ा हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल समाप्त होने के बाद भी आंदोलन की रफ्तार कम नहीं हुई। सरकार की शुरुआती उम्मीदों के उलट, छात्रों का विरोध और अधिक तेज होता गया।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्तर पर तैयार आकलन में भी लगभग यही तस्वीर सामने आई। रिपोर्ट में आशंका जताई गई कि आंदोलन कई राज्यों में फैल सकता है और युवाओं की बड़ी भागीदारी इसे और गंभीर बना सकती है।
बताया गया कि शुक्रवार को दिल्ली पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी आंदोलन को अधिक समय तक लंबा नहीं खींचने की सलाह दी। वहीं, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी संघ के कुछ नेताओं से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा और पूरे घटनाक्रम पर चर्चा की।
इन रिपोर्टों के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी तेजी से फैसले लिए गए। राजधानी दिल्ली में केंद्रीय बलों की 45 कंपनियां तैनात की गईं। साथ ही, आईबी के इनपुट के आधार पर 16 अतिरिक्त कंपनियों को विभिन्न राज्यों से दिल्ली बुलाने के निर्देश दिए गए।
इन कदमों से साफ संकेत मिल रहा था कि सरकार किसी भी संभावित स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती थी। लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक समाधान तलाशने की कोशिशें भी तेज हो गईं।
और फिर घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ लिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और आंदोलन को लेकर सरकार की ओर से कुछ अहम आश्वासन भी सामने आए।
सरकार के फैसलों के पीछे कई तरह के राजनीतिक, प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी कारण हो सकते हैं। यह भी संभव है कि विभिन्न एजेंसियों के आकलन और बदलते हालात ने निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित किया हो। हालांकि, इन रिपोर्टों की आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है। इतना जरूर है कि नीट पेपर लीक आंदोलन ने सरकार और विपक्ष दोनों के लिए आने वाले समय की राजनीति के कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि इस पूरे घटनाक्रम का असर युवाओं की राजनीति और भविष्य की नीतियों पर कितना पड़ता है।