चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी ने कहा है कि गन्ना उत्पादन में कमी के पीछे रेड रॉट बीमारी और अल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियां प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि इन मौसम संबंधी प्रभावों से सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। हाल के दिनों में घरेलू चीनी कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी गई है, जिसके बाद केंद्र सरकार ने बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए कदम उठाए हैं।
मंत्री के मुताबिक भारत में सालाना चीनी की आवश्यकता करीब 280 लाख टन है और फिलहाल देश में लगभग 20 से 25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है। इसके बावजूद आगामी त्योहारी सीजन में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए सरकार ने आपूर्ति को लेकर एहतियाती कदम उठाए हैं। सरकार ने हाल ही में 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है, जिसे 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा। करीब एक दशक बाद भारत ने चीनी आयात की ऐसी बड़ी व्यवस्था की है।
सरकार का मानना है कि त्योहारी सीजन के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की खपत बढ़ने से बाजार पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है। इसी वजह से घरेलू आपूर्ति मजबूत करने और कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए आयात को अस्थायी उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक आयातित चीनी की उपलब्धता बढ़ने से घरेलू बाजार में कीमतों की तेजी पर कुछ हद तक लगाम लग सकती है।
हालांकि, चीनी कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्ष ने सरकार की नीतियों, गन्ने के इस्तेमाल और उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। वहीं केंद्र का कहना है कि मौजूदा स्थिति में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और त्योहारी मांग के दौरान पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना प्राथमिकता है। सरकार के ताजा कदमों का उद्देश्य बाजार में कृत्रिम कमी और जमाखोरी की स्थिति को रोकना भी है।
कुल मिलाकर, सरकार फिलहाल घरेलू उत्पादन में कमी, मौसम की चुनौती और त्योहारी मांग—तीनों को ध्यान में रखते हुए चीनी बाजार को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है। आने वाले महीनों में घरेलू उत्पादन और आयातित चीनी की उपलब्धता यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि चीनी की बढ़ी हुई कीमतों को कितना नियंत्रित किया जा सकता है।