कांवड़ यात्रा का धार्मिक और सांस्कृ़तिक महत्व तो सब जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इसका वैज्ञानिक महत्व भी प्रमाणित किया गया है। और इस यात्रा की शुरूआत किसने की थी। भगवान राम ने ही सबसे पहले कांवड़ यात्रा की थी। कांवड़ लंबी पैदल यात्रा है, जिसमें पानी से भरा एक सजाया हुआ बर्तन ले जाना शामिल है और उससे जुड़ी भक्ति, हिंदू श्रावण मास के दौरान मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। यह तीर्थयात्रा आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों लाभों के लिए की जाती है। तीर्थयात्रा के दौरान लयबद्ध मंत्रोच्चार और आवश्यक एकाग्रता के मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं, जबकि शारीरिक गतिविधि चयापचय और हड्डियों के स्वास्थ्य में सुधार करती है।
यह वैज्ञानिक तथ्य चौधरी चरण सिंह विवि के भौतिक विज्ञान विभाग के प्रो. संजीव कुमार शर्मा के अध्ययन में सामने आए हैं। प्रो. संजीव कुमार के अनुसार बिना जूते-चप्पल के पैदल चलना एक विज्ञान है। अक्सर इसका पालन विशेष रूप से घरों, मंदिरों या कांवड़ यात्रा में किया जाता है। रेत, मिट्टी या मिट्टी के रास्ते पर चलना बेहतर होगा, क्योंकि वहां हम पृथ्वी ग्रह के साथ कनेक्ट हो जाते हैं। जिससे हमारी नेगेटिव आयन (नकारात्मक ऊर्जा) पृथ्वी पर रिलीज हो जाती है। बरसात के मौसम में आकाशीय बिजली गिरने पर, सभी नेगेटिव आयन (नकारात्मक ऊर्जा) तांबे के तारों के द्वारा पृथ्वी में चले जाते हैं और इमारत की सुरक्षा करते हैं। ऐसे में सभी ऋणात्मक आयन पृथ्वी में समा जाते हैं, जिससे इमारत सुरक्षित रहती है।
गोमुख, ऋषिकेश, हरिद्वार सहित पहाड़ों से स्वच्छ जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है। शिव मंदिर की संरचना आमतौर पर इस प्रकार बनाई जाती है कि शिवलिंग को केंद्र में रखकर उसकी परिक्रमा की जाती है। मंदिर की छत के केंद्र में धातु का कलश या त्रिशूल स्थापित किया गया है। इसका अर्थ है कि सभी चुंबकीय प्रवाह धातु के कलश के केंद्र से जुड़कर 30 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर गति करते हैं और ये प्रवाह तीर्थयात्रियों के सिरों पर पड़ते हैं और नकारात्मक ऊर्जा को मुक्त करते हैं। ये भौतिकी, पदार्थ और प्रकाशिकी के नियम हैं।