कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर कहा, "आप ही लोग तो राज कर रहे हैं तो क्या हिंदू अभी भी एकजूट नहीं हुआ। अभी भी आपको हिंदू की ताकत पर आपको भरोसा नहीं है। आप हिंदू के साथ नहीं थे लेकिन हिंदू यही थे, हम जो हिंदुत्व की बात करते हैं नफरत फैलाने वाले नहीं ये हिंदुस्तान की हिंदू है और आप जो हिंदू की बात करते हो वो नफरत फैलाने वाले पर बोलते हो। आपकी ही सरकार है तो नॉर्थ ईस्ट में ऐसा क्यों हो रहा है नॉर्थ ईस्ट में ईसाई लोग ज्यादा रहते हैं तो कही ये तो नहीं इसी वजह से हमला हो रहा है..ये तो नहीं कि आपके प्रचार की वजह से ये हमले बढ़ते जा रहे हैं.सरकार को कड़ी कार्रवाई करने से किसने रोका है?
आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत अक्सर 'हिंदुत्व' और 'हिंदू' शब्द की व्यापक परिभाषा पर जोर देते हैं, जिसका मूल सार उनके अनुसार भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। उनके बयानों का मुख्य बिंदु यह रहता है कि भारत में रहने वाले सभी लोग, जिनके पूर्वज भारतीय हैं और जो भारत माता को अपनी पितृभूमि मानते हैं, वे व्यापक अर्थों में 'हिंदू' हैं। भागवत के अनुसार, हिंदुत्व कोई संकुचित धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि एक जीवन पद्धति और सभ्यतागत पहचान है जो विविधता में एकता का समर्थन करती है। उनके हालिया और चर्चित संबोधनों में अक्सर इन तीन प्रमुख स्तंभों पर बात की गई है:
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: भागवत का तर्क है कि पूजा पद्धति (चाहे कोई मुस्लिम हो, ईसाई हो या सिख) अलग हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीयता और संस्कृति के नाते सभी 140 करोड़ भारतीय हिंदू हैं। वे इसे एक समावेशी पहचान के रूप में देखते हैं जो जोड़ने का काम करती है।
उनके बयानों में यह स्पष्ट रहता है कि हिंदुत्व का अर्थ किसी पर अपनी विचारधारा थोपना नहीं, बल्कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए समाज की सेवा करना है। उनके अनुसार, हिंदू होना किसी विशेष कर्मकांड से ज्यादा एक राष्ट्रीय भावना है।
भागवत अक्सर कहते हैं कि हिंदुत्व 'वसुधैव कुटुंबकम' (पूरी दुनिया एक परिवार है) के विचार को साकार करता है। वे इसे दुनिया की समस्याओं का समाधान मानते हैं क्योंकि यह कट्टरता के बजाय स्वीकार्यता सिखाता है।
हालांकि, उनके इन बयानों पर अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी छिड़ती है। आलोचकों का तर्क है कि 'हिंदू' शब्द का इस तरह विस्तार करना अल्पसंख्यकों की विशिष्ट धार्मिक पहचान को प्रभावित कर सकता है। वहीं, संघ का रुख यह रहता है कि वे केवल उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को याद दिला रहे हैं जो सभी भारतीयों को एक सूत्र में पिरोती है।