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सिरमौर: शिलाई के शरली गांव में विवाह और समाज सुधार पर बड़े फैसले, दहेज पर रोक और बारातियों की संख्या होगी सीमित

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के शिलाई क्षेत्र के मस्तभोज स्थित शरली गांव ने विवाह समारोहों में बढ़ते खर्च, सामाजिक कुरीतियों और नशे के खिलाफ सामूहिक पहल की है। गांव के वरिष्ठ नागरिकों और युवाओं ने 25 अक्तूबर 2026, रविवार को शरद पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित बैठक में विचार-विमर्श के बाद विवाह और समाज सुधार से जुड़े कई निर्णय सर्वसम्मति से लिए। इन फैसलों का उद्देश्य शादियों में अनावश्यक खर्च कम करना, सामाजिक समानता को बढ़ावा देना, पारंपरिक रीति-रिवाजों को सरल बनाना और युवाओं को नशे से दूर रखने के प्रयास करना है। बैठक में तय किया गया कि इन नियमों को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाएगा। उल्लंघन करने वालों के खिलाफ गांव और पंचायत के स्तर पर कार्रवाई का प्रावधान रखने की बात भी कही गई है। शरली गांव में शादी के दौरान होने वाले कई खर्चीले रीति-रिवाजों को बंद करने का निर्णय लिया गया है। रिश्ता तय करते समय गांव के लिए भोज यानी माश खाने की परंपरा, लकड़ी काटने के समय पूरे गांव की धाम, शादी के बाद कारबारिया (टोलुआ) की दावत और पुल्टोज की परंपरा बंद कर दी गई है। अब रिश्ता तय करते समय लड़के के साथ उसके परिवार के सदस्य ही जाएंगे। इसी तरह पुल्टोज की रस्म में भी दूल्हा-दुल्हन के साथ उनके परिवार के सदस्य ही शामिल होंगे। गांव के लोगों की सामूहिक भागीदारी वाली इन रस्मों से होने वाले खर्च को कम करना इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य है। शादी से पहले घर में मामा के स्वागत के लिए होने वाली खर्चीली दावत बंद करने का निर्णय लिया गया है। अब उस दिन केवल मामा-मामी या परिवार के सदस्य ही शगुन लेकर आएंगे। इस अवसर पर घर में डीजे भी नहीं बजेगा। भांजे की शादी में गांव के अन्य लोग मुख्य दावत यानी बारात वाले दिन सामूहिक रूप से अपने खर्च पर मोउले के रूप में जाएंगे। भांजी की शादी में भी पहले दिन केवल मामा-मामी, भाई या परिवार के सदस्य जाएंगे, जबकि गांव के लोग मुख्य दावत के दिन एक साथ शामिल होंगे। रिश्तेदारों को शादी से पहले ही इन नियमों की जानकारी देने का निर्णय लिया गया है, ताकि किसी तरह की गलतफहमी न हो। शादी में अनावश्यक भीड़ और खर्च कम करने के लिए बारातियों की संख्या सीमित करने का फैसला लिया गया है। निर्धारित व्यवस्था के अनुसार, अपने बेड़े से प्रति परिवार एक व्यक्ति और अन्य बेड़ों से प्रति बेड़ा पांच-पांच व्यक्तियों की भागीदारी तय की गई है। इसके अतिरिक्त रिश्तेदार भी शामिल हो सकेंगे, लेकिन बारातियों की कुल संख्या को सीमित रखने पर जोर दिया गया है। बड़ी शादी में मुख्य दावत पहले दिन शाम को होगी। दूसरे दिन नेवदा रस्म के साथ दोपहर में मेहमानों और पूरे गांव के लोगों के लिए सामुदायिक भवन में एक साथ धाम आयोजित की जाएगी। परिवार अपनी सुविधा के अनुसार सुबह या शाम को एक ही दावत रखने का विकल्प भी चुन सकेंगे। सोने-चांदी की बढ़ती कीमतों और शादी में आभूषणों के प्रदर्शन से होने वाले आर्थिक दबाव को देखते हुए दुल्हन के गहनों की सीमा निर्धारित की गई है। निर्णय के अनुसार, शादी में दुल्हन सोने के तीन गहने—मंगलसूत्र, नाक और कान के आभूषण—तथा चांदी के दो गहने—पायल और पुलड़ी—पहन सकेगी। शादी समारोह के अलावा गांव की महिलाएं अपनी इच्छा के अनुसार गहने पहन सकती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि इस पहल से शादी के खर्च में कमी आएगी और महिलाओं के बीच सामाजिक समानता तथा समरूपता को बढ़ावा मिलेगा। शादी के पहले दिन शाम को भोजन के बाद रात 12 बजे तक डीजे बजाने की अनुमति देने का निर्णय लिया गया है। नेवदा रस्म के दिन हाटी लोक संस्कृति और गीतों का मुजरा कार्यक्रम होगा। दोपहर के भोजन के बाद शाम पांच बजे तक महिला-पुरुष संयुक्त रूप से डीजे पर नाच-गाना कर सकेंगे। इन नियमों के माध्यम से मनोरंजन के साथ पारंपरिक लोक संस्कृति को भी महत्व देने की बात कही गई है। गांव में लड़के और लड़की की शादी में दहेज लेने और देने पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया है। लड़की को परंपरागत सोबे के रूप में पांच बर्तन, एक संदूक और कपड़े दिए जा सकेंगे। इसके अलावा बिना दिखावे के नकद राशि गुप्त दान के रूप में देने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। भांजे की शादी में सेहरा-चोटी के साथ सूट-बूट और लड़के की माता को एक सूट देने का निर्णय लिया गया है। अन्य लोगों को बंद लिफाफे में शगुन दिया जा सकेगा। भांजी की शादी में उसे एक परात और सूट-बूट तथा उसकी माता को एक सूट दिया जाएगा। परिवार के अन्य सदस्यों को बंद लिफाफे में शगुन देने की व्यवस्था रहेगी। शादी की रस्मों के दौरान रिश्तेदारों में किसी तरह की दुविधा न हो, इसके लिए पंडित और नाई को दी जाने वाली राशि भी निर्धारित की गई है। निर्णय के अनुसार, विवाह संस्कार के दौरान वेदी पर रस्में संपन्न करवाने वाले पंडित को 1,100 रुपये दिए जाएंगे। वहीं, शादी के निमंत्रण देने जाने वाले नाई को रास्ते के किराये के अतिरिक्त 1,100 रुपये नकद देने और उसके परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करने का फैसला लिया गया है। भांजे की शादी में डंग के एवज में मस्तभोज खत के पूर्व निर्धारित 105 रुपये देने की व्यवस्था भी जारी रखने का उल्लेख किया गया है। युवाओं में नशे के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए शरली गांव में शराब सहित किसी भी तरह के नशे की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया है। नशा बेचने वालों के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कार्रवाई के साथ पुलिस प्रशासन में शिकायत दर्ज कराने की बात कही गई है। बारात में शराब ले जाने पर भी पूरी तरह रोक लगाने का फैसला हुआ है। शादी की दावतों में शराब परोसने की परंपरा को सीमित किया गया है और भविष्य में इसे चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह बंद करने का प्रयास करने पर सहमति बनी है। बेटी के घर बच्चे के जन्म पर होने वाली रस्मों को लेकर भी बदलाव किया गया है। अब लड़की की मां, चाची, भाभी, बहन, बुआ या उसी परिवार से संबंधित महिलाएं प्रसूता बेटी और उसके परिवार के लिए भोजन लेकर जाएंगी। गांव की सभी महिलाओं के सामूहिक रूप से जाने और अन्य सामग्री ले जाने की परंपरा को बंद करने का निर्णय लिया गया है। अपने घर में बच्चे के जन्म पर आने वाले रिश्तेदारों, विशेषकर बहू के मायके वालों को भी इन नियमों की जानकारी पहले ही देने की बात कही गई है। बैठक में ग्रामीणों से आग्रह किया गया कि वे सर्वसम्मति से लिए गए निर्णयों का ईमानदारी से पालन करें और अपने रिश्तेदारों को भी इनके बारे में जानकारी दें। साथ ही, भविष्य में जरूरत के अनुसार अन्य समाज सुधार संबंधी निर्णय लेने की बात कही गई। शरली गांव की यह पहल विवाह में होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करने, दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों पर रोक लगाने और सामुदायिक स्तर पर सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

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