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कुल्लू दशहरा: आगाज से समापन तक माता हिडिंबा की विशेष भूमिका

अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में माता हिडिंबा का विशेष स्थान है। उत्सव के आगाज से लेकर समापन तक निभाई जाने वाली देव परंपराओं में माता की भूमिका अहम रहती है। मान्यता के अनुसार, जब तक माता हिडिंबा राजमहल में विराजमान नहीं होतीं, तब तक भगवान रघुनाथ अपने देवालय से उत्सव के लिए रवाना नहीं होते। इसके अलावा उत्सव के दौरान होने वाली नरसिंह की जलेब और मोहल्ला में भी माता की उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। कुल्लू दशहरा उत्सव के दूसरे दिन से शुरू होने वाली नरसिंह की जलेब में भी माता हिडिंबा से जुड़ी परंपरा निभाई जाती है। मान्यता के अनुसार, जब तक राजा माता के अस्थायी शिविर में माथा नहीं टेक लेते, तब तक जलेब आगे नहीं बढ़ती। इसी तरह उत्सव के छठे दिन होने वाला मोहल्ला भी माता की हाजिरी के बाद ही शुरू होता है। मोहल्ला के दिन माता हिडिंबा पहले भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर और चानणी में हाजिरी लगाती हैं। इसके बाद विभिन्न घाटियों से पहुंचे देवी-देवता अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उत्सव के समापन में भी माता की भूमिका विशेष रहती है। माता के लंकाबेकर से लौटने के बाद ही दशहरा उत्सव की समापन परंपरा पूरी होती है। माता हिडिंबा के गुर देवी सिंह के अनुसार, उत्सव के आगाज से पहले रघुनाथपुर से छड़ी माता को लेने के लिए रामशिला आती है। इसके बाद माता आगे बढ़ती हैं और राजमहल में विराजमान होती हैं। माता के राजमहल पहुंचने के बाद ही भगवान रघुनाथ के मंदिर में अस्त्र-शस्त्र पूजन होता है और आगे की देव प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद रथयात्रा में भी माता की भूमिका रहती है। मोहल्ला के दिन भगवान रघुनाथ के शिविर से माता को लेने के लिए देव निशान आता है। माता मोहल्ला में पहुंचकर भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में हाजिरी लगाती हैं। इसके बाद अन्य देवी-देवता भी वहां पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। लंकाबेकर से लौटने के बाद होता है समापन माता हिडिंबा की भूमिका उत्सव के अंतिम चरण में भी महत्वपूर्ण रहती है। गुर देवी सिंह के अनुसार, समापन के दौरान माता रथयात्रा के साथ आगे बढ़ती हैं। मैदान के अंतिम छोर पर अन्य देवी-देवता रथ के साथ रुक जाते हैं, जबकि माता लंकाबेकर तक जाती हैं। वहां परंपरा निभाने के बाद माता वापस लौटती हैं। इसके बाद ही दशहरा उत्सव का समापन होता है। कुल्लू राजपरिवार की दादी मानी जाती हैं माता हिडिंबा लोक मान्यताओं के अनुसार, माता हिडिंबा को कुल्लू राजपरिवार की अधिष्ठात्री देवी के रूप में सम्मान प्राप्त है। इसी कारण उन्हें राजपरिवार की दादी भी कहा जाता है। मान्यता है कि माता ने कुल्लू के प्रथम राजा विहंगमणिपाल को राज्य स्थापित करने का आशीर्वाद दिया था। परंपरा के अनुसार, माता हिडिंबा के मनाली से कुल्लू पहुंचने के बाद ही दशहरा उत्सव की शुरुआत होती है। इस तरह माता हिडिंबा की उपस्थिति कुल्लू दशहरा उत्सव की धार्मिक मान्यताओं, राजपरिवार की परंपराओं और देव संस्कृति का अहम हिस्सा है।

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