कस्बे में बना सभागार अब जनता के लिए सुविधा बनने की बजाय “सफेद हाथी” साबित होता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री घोषणा के साढ़े नौ साल बीत जाने के बावजूद जुलाना के लोगों को अब तक सभागार की सुविधा नहीं मिल पाई है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी न तो भवन पूरा हो सका और न ही इसे जनता को सौंपा जा सका। उल्टा, उद्घाटन से पहले ही इसकी हालत जर्जर होने लगी है, जिससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 23 मई 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जुलाना में एक भव्य सभागार बनाने की घोषणा की थी। इस परियोजना का उद्देश्य जुलाना कस्बे के साथ-साथ आसपास के गांवों के लोगों को सामाजिक, सांस्कृतिक और सरकारी कार्यक्रमों के लिए बेहतर सुविधा उपलब्ध कराना था। इसके लिए उस समय साढ़े चार करोड़ रुपये के बजट की मंजूरी दी गई। हालांकि घोषणा के करीब तीन साल बाद वर्ष 2019 में सभागार का निर्माण कार्य शुरू हो सका। निर्माण कार्य 15 मार्च 2021 तक चला, लेकिन बजट समाप्त होने के कारण काम बीच में ही रोक दिया गया। इस दौरान भवन का बड़ा हिस्सा अधूरा रह गया। इसके बाद चार साल तक सभागार का काम पूरी तरह ठप रहा। इस लंबे अंतराल में अधूरी इमारत मौसम और उपेक्षा का शिकार होती रही। करीब चार साल बाद 22 अप्रैल 2025 को एक बार फिर से ढाई करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि स्वीकृत कर दोबारा टेंडर लगाया गया और निर्माण कार्य शुरू किया गया। लेकिन इतने लंबे समय तक अधूरा पड़े रहने के कारण भवन की हालत खराब हो चुकी है।सभागार के मुख्य गेट पर लगा कांच टूट चुका है, वहीं छत की सिलिंग जगह-जगह से टूटकर नीचे गिर रही है। इससे यह साफ झलकता है कि निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और रखरखाव दोनों ही सवालों के घेरे में हैं। अब तक सभागार पर लगभग सात करोड़ रुपये की लागत आने की संभावना जताई जा रही है। इसके बावजूद करीब दस साल बीत जाने के बाद भी लोगों को यह सुविधा मिलने की कोई निश्चित तारीख नजर नहीं आ रही है। सभागार का निर्माण कार्य चल रहा है और फरवरी तक यह कार्य पूरा हो जाएगा। उसके बाद सभागार को जनता को सौंप दिया जाएगा। जिससे लोगों को सुविधा मिलेगी।